Friday, October 24, 2008

दूसरा गांधी तलाश लो

एक बार एक कट्टर धार्मिक संस्था ने गांधीजी को मोटी रकम दान में देनी चाही। लेकिन साथ ही उसने यह शर्त भी रखी कि वह यह रकम हरिजन व मुसिलमो के लिये खर्च नही करेगे।इस पर गाँधी जी कुछ देर तक मौन हो गए फ़िर उन्होंने बड़े ही उदारता पूर्वक कहा , "भई यह राशि मै नही ले सकता क्योकि मै तो खर्च ही इन वर्गो के लिए करता हूं। इस राशि के लिए आप किसी अन्य गांधी की तलाश करे।"

राज ठाकरे पर हत्या का मामला दर्ज

मुम्बई में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने गए नालंदा के एक छात्र की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं द्वारा पीटे जाने से हुई मौत के बाद मनसे प्रमुख राज ठाकरे के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो गया है। मनसे कार्यकर्ताओं के कथित हमले में मारे गए बिहार के नालंदा जिले के छात्र पवन के पिता की शिकायत पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे और उनके 200 अज्ञात समर्थकों के खिलाफ शुक्रवार को बिहारशरीफ की एक अदालत में हत्या का मामला दर्ज किया गया। पवन के पिता जगदीश प्रसाद की शिकायत पर ठाकरे और उनके समर्थकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा- 302, 120/बी, 147, 148 तथा 149 के तहत मामला दर्ज किया गया है। प्रसाद के अधिवक्ता कामेश प्रसाद ने बताया कि ठाकरे और उनके समर्थकों के खिलाफ मामला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अभिमन्यु लाल श्रीवास्तव की अदालत में दर्ज किया गया है।गौरतलब है कि पवन रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने मुंबई गया था, जहां सोमवार को उसकी हत्या हो गई थी। मंगलवार को पवन का शव पटना लाया गया था।

धर्म की शरण में मैडोना

पॉप स्टार मैडोना क्रोध पर काबू पाने और तनाव भगाने के लिए धार्मिक परामर्शदाताओं की मदद ले रही हैं ताकि पूर्व पति गाइ रिची के साथ तलाक की कार्रवाई वे शांति से आगे बढ़ा सकें।वेबसाइट 'द सन डॉट को डॉट यूके' के अनुसार मैडोना के करीबी सूत्रों की मानें तो अपनी शादी से जुड़े सारे विवरणों के सार्वजनिक हो जाने और तलाक के बदले गाइ की पैसों की बढ़ती मांग को देख मैडोना बेहद नाराज और दुखी हैं।"यही कारण है कि मैडोना अपने क्रोध और तनाव को काबू में रखने के लिए इन दिनों कुछ धार्मिक सलाहकारों की सहायता ले रही हैं।

Thursday, October 23, 2008

स्वामी रामदेव के गुरु लापता

योग गुरु स्वामी रामदेव और उनका आश्रम दिव्य योग ट्रस्ट एक बार फिर विवादों में फंसता नजर आ रहा है.इस बार उनकी दवाओं-दावों और जड़ी-बुटियों के कारण नहीं बल्कि उनके ख़ुद के गुरु स्वामी शंकरदेव के रहस्यमय ढंग से लापता हो जाने और उनके ट्रस्ट के स्वामित्व पर विवाद से सवाल उठ रहे हैं.स्वामी रामदेव का आश्रम दिव्य योग ट्रस्ट हरिद्वार के कनखल इलाके में है और पिछले 12 सालों से उनके गुरु स्वामी शंकरदेव उनके साथ ही यहां रहते थे. रामदेव इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और शंकरदेव संरक्षक हैं.शंकरदेव रामदेव के दीक्षा गुरु हैं और रामदेव ने उनसे योग और आयुर्वेद की शिक्षा ली है.पुलिस में दर्ज कराई गई गुमशमदगी की रिपोर्ट के अनुसार शंकरदेव 14 जुलाई की शाम को आश्रम से सैर के लिए निकलने के बाद नहीं लौटे हैं.स्वामी रामदेव इस समय अपने सहयोगियों के साथ विदेश दैरे पर हैं.उनकी अनुपस्थिति में ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता आचार्य बालकृष्ण ने बीबीसी को बताया, ''शंकरदेव ज़्यादातर कार से ही आना-जाना करते थे लेकिन उस दिन शाम को रिक्शे से गए लेकिन फिर लौटे नहीं.पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी है और हम भी अपने स्तर से छानबीन कर रहे हैं लेकिन अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है.''

शरीर और मन

शरीर और मन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. शरीर मन का स्थूल रूप है और मन शरीर का सूक्ष्म रूप. लेकिन हम स्थूलरूपी शरीर को ही सब कुछ मान लेते हैं और मन को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाते.
वेदान्त मत में मन या अंत:करण की उत्पत्ति बतायी गयी है। मन पारमार्थिक नित्य पदार्थं नहीं है, अत: यह एक भौतिक पदार्थ है और वह मध्यम परिणाम वाला है। एक ही अंत:करण या मन संशय, निश्चय, गर्व और स्मरण इन चार प्रकार की वृत्तियों के कारण क्रमश: मन, बुद्धि, अहंकार औैर चित्त कहलाता है और यह अंत:करण है अर्थात शरीर के भीतर रहने वाला काम संकल्पादि धर्मों को उत्पन्न करने का असाधारण कारण है। सुदूर वैदिक काल से लेकर आज तक वाङमय में मन और उसके कार्य कलापों का वर्णन होता चला आ रहा है जो उसके महत्व को प्रदर्शित करता है। शुक्ल यजुर्वेद में 24 वें अध्याय के प्रथम छ:मंत्रों का देवता ही मन है। मन विषयक ऐसा आलोकमय सुदंर वर्णन विश्व के साहित्य में दुर्लभ ही है। शुक्ल यजुर्वेद का निम्लिखित मंत्र बड़े सुंदर शब्दों में इस तथ्य का प्रतिपादन करता है -
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च, यज्ज्योतिरन्तरमूतं प्रजासु।यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु॥
मन ही सामान्य ज्ञान रूपी चेतस है। मन धृति है, मन अंत:ज्योति है औैर सब इंद्रियों का प्रकाशक है। मन ही अमृत, अमरणधर्मी आत्मा है। मन के बिना कोई भी बाह्य अथवा आंतरिक क्रिया या कर्म मनुष्यों के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मन के बिना न चिंतन हो सकता है और न मन की प्रेरणा के बिना शरीर की कोई बाह्य चेष्टा हो सकती है। शरीर वर्तमान काल के पिंजड़े में आबद्ध रहता है। वह अतीत काल और भविष्य काल में गमन नहीं कर सकता, किन्तु मन अतीत काल मेें वर्तमान की सीमा काउल्लंघन करके जा सकता है । ब्राह्मण तथा उपनिषद् ग्रंथों में भी मन अथवा मन के पर्यायवाची शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है। अमरकोष में आये हुये मन के अन्य पर्याय शब्दों को भी वैदिक संहिताओं में देखा जा सकता है। (अ) ऋग्वेद में मन मनोजविष्ठं। ज्योर्तिहृदय आहितं यत्।यह कहकर मन की सत्ता स्वीकार की गयी है और मन के वेग, ज्ञान में मन को प्रकाश और हृदय में उसकी स्थिति बनायी गयी है। (आ) शुक्ल यजुर्वेद में मन मनसा परिक्रमा विषय के अंतर्गत मन का सुंदर वर्णन तथा मन की शक्तियों की ओर संकेत मिलता है। इन छ: मंत्रों का देवता ही मन है। यथा-यााग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।दूरगमं ज्योतिषा ज्योतिरेकं तन्ये मन: शिवसंकल्पमस्तु॥येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा:।यदपूर्व यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु॥(इ) सामवेद में मन आ ते वत्सो मनो यमत्परमच्चित्सधस्थात्।अग्े त्वां कामये गिरा॥ इसी प्रकार मन शब्द का प्रयोग सामवेद के अनेक स्थलों में किया गया है। मनीषा शब्द सामवेद में आया ह(ई) अथर्ववेद में मन यथा मनो मनस्केते: परापत्याशुमत्।एवा त्वं कासे प्रपत मनसोनु प्रवाच्यम॥(उ) गायत्री मंत्र में मनधियो योन: प्रचोदयात्.......।उक्त मंत्र में 'धी' शब्द का प्रयोग मन(बुद्धि) के लिए मिलता है। उदाहरण के लिए ही यहां कुछ शब्द उद्धृत किये गये हैं। वैदिक कोष में ये शब्द सरलता से मिल जाते हैं।

पुनर्विचार भारतीय संस्कृति

सांस्कृतिक प्रतीकों पर पुनर्विचार भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। आज जब विज्ञान ने पारस्परिक दूरियाँ बहुत कम कर दी हैं तो विश्व को ?ग्लोबल विलेज? कहा जाने लगा है। एक देश की संस्कृति दूसरे देश की संस्कृति को प्रभावित भी कर रही है। ऐसे समय में हमारे लिए यह पुनर्विचार का विषय है कि विश्व के अन्य देशों के सम्फ में आकर हम अपनी संस्कृति को कितना छोडें और दूसरी संस्कृतियों को कितना अपनायें ? अब उनसे बचना या आँख मूँदकर अवहेलना करना भी सम्भव नहीं। ऐसे में तो हम कूप मंडूक बन कर ही रह जायेंगे। ऐसे में क्यों न हम पहले अपनी ही संस्कृति को जाँचें, परखें ? यदि वह वर्तमान में हमारी कसौटी पर खरी उतरती है तो दूसरों का अंधानुकरण क्यों किया जाये ? भारतीय संस्कृति के ज्ञान, विज्ञान, स्वास्थ्य सौन्दर्य एवं धर्म, ये पाँच आधार गए बतलाये हैं। हमारी संस्कृति इन्हीं आधार स्तम्भों पर विकसित हुई है। हमारे जीवन में जो आज कर्मकाण्ड दिखलाई पड रहा है लेखक ने उसका वैज्ञानिक महत्त्व बतलाया है जैसे मस्तक पर तिलक या बिन्दी क्यों लगाते हैं ? तिलक में अक्षत का ही प्रयोग क्यों किया जाता है। वस्तुतः यह आवश्यक भी है क्योंकि कुछ लोग इसे अंधानुकरण और ढोंग बतलाकर इसका उपहास भी करते हैं। हमारे देश में गाय को माता कहकर आज भी सम्बोधित किया जाता है किन्तु स्वतंत्र भारत में गाय का जिस प्रकार वध और उपेक्षा हो रही है। पंचगव्य? का वैज्ञानिक महत्त्व है जो आँखें खोल देने वाला है। इस प्रकार गाय को यदि हमारी संस्कृति की धुरी कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं है। श्रावणी पर्व या रक्षाबंधन का भी भारतीय जीवन में अत्यन्त महत्त्व है। इस अवसर पर प्राचीन युग में यज्ञोपवीत संस्कार के उपरान्त बालक को विद्याध्ययन के लिए भेज दिया जाता था। इसी प्रकार इस अवसर पर रक्षासूत्र बाँधकर रक्षा का आश्वासन भी दिया जाता था। सांस्कृतिक पर्व-गुरु पूर्णिमा? में इस पर्व का महत्त्व तथा गुरु की महानता पर प्रकाश डाला गया है। हमारे दैनिक जीवन में मेहन्दी का भी बहुत महत्त्व है किसी भी पर्व पर या शादी के अवसर पर तथा कभी वैसे ही स्त्रियाँ मेहन्दी लगाती हैं। मेहन्दी का सांस्कृतिक महत्त्व तो है ही साथ ही यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद है। यहाँ पैदा होने वाली विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियों का मानव जीवन में कितना उपयोग है, ?

क्या मर्यादा पुरुसोत्तम ने पित्रि धर्म का पालन किया ?

श्री राम की मर्यादा सुविख्यात है, उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है। मर्यादा-पुरुषोत्तम अर्थात् ‘मर्यादा का पालन करने वाले पुरुषों में उत्तम’। किन्तु कई प्रसंग ऐसे हैं जिनसे भ्रम सा होने लगता है कि शायद कहीं कहीं पर श्री रामचन्द्र जी ने शायद मर्यादा का पालन नहीं किया है। महाराज दशरथ तथा जटायु के मृत्यु के प्रसंग इसके अन्तर्गत आते हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में महाराज दशरथ की मृत्यु का वर्णन करते हुये लिखा है:-
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।राम राम कहि राम कहि राउ गये सुरधाम॥
अर्थात् राम का नाम रटते-रटते महाराज दशरथ सुरधाम (देवलोक) सिधार गये।
यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य बात है कि महाराज दशरथ देवलोक गये जिसे कि हिन्दू मान्यता के अनुसार 6वाँ लोक माना जाता है और फिर से जन्म ले कर वहाँ से पुनः पृथ्वी लोक में आने के पर्याप्त अवसर बने रहते हैं। मतलब यह कि महाराज दशरथ का मोक्ष नहीं हुआ (मान्यता है कि विष्णुलोक जिसे कि हरिधाम भी कहा जाता है और जो कि 7वाँ लोक है पहुँचने पर ही मोक्ष होता है)। सभी को विदित है कि यदि मृत्यु के समय एक बार भी राम का नाम मुख से निकले तो मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यहाँ पर तो दशरथ की मृत्यु राम राम रटते हुये ही हुई थी। फिर भी श्री राम ने, जो कि भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, उन्हें मोक्ष प्रदान नहीं किया। यहाँ तक कि राम ने अपने पिता का अन्तिम संस्कार भी नहीं किया जबकि ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते यह उनका कर्तव्य था।
दूसरी ओर तुलसीदास जी जटायु की मृत्यु का वर्णन करते हुये लिखते हैं:-
अविरल भगति मांगि वर गीध गये हरिधाम।तेहिके क्रिया जथोचित निज कर कीन्हीं राम॥
अर्थात् जटायु विष्णुलोक गये, उनका मोक्ष हो गया और जटायु का क्रियाकर्म स्वयं अपने हाथों से किया।
इन प्रसंगों को पढ़ कर पहली दृष्टि में लगता तो यही है कि श्री राम ने शायद कहीं कहीं पर मर्यादा का पालन नहीं किया। किन्तु ऐसा नहीं है। उपरोक्त दोनों दोहों की सही व्याख्या करने से भ्रम दूर हो जाता है। वास्तव में अपनी मृत्यु के समय महाराज दशरथ मोहवश अपना पुत्र समझ कर राम का नाम जप रहे थे न कि मोक्षदाता भगवान विष्णु समझ कर। और हिन्दू दर्शन के अनुसार मृत्यु के समय जरा भी मोह रह जाने से मोक्ष कभी प्राप्त हो ही नहीं सकता। अपने पिता के वचन पालन करके सांसारिक मर्यादा निभाने के लिये ही श्री राम अपने पिता के अन्तिम संस्कार करने के लिये अयोध्या वापस नहीं आये। यदि वे वापस आ गये होते तो पिता का वचन पालन न करने का आरोप अवश्य ही उन पर लग गया होता। वे यह भी जानते थे कि हिन्दू कर्मकाण्ड के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र की अनुपस्थिति में कनिष्ठ पुत्र को अन्तिम संस्कार करने का पूर्ण अधिकार है।
जटायु की मृत्यु के प्रसंग में तुलसीदास जी लिखते हैं कि ‘अविरल भगति मांगि वर’ अर्थात् जटायु की भक्ति अविरल थी और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्री राम न उनसे वरदान मांगने के लिये कहा था। इस पर जटायु ने दो वर मांगे थे - पहला मोक्ष प्राप्ति का और दूसरा अपना क्रिया कर्म स्वयं भगवान के हाथों से कराने का जो कि ‘भूतो न भविष्यति’ कार्य है। श्री रामचन्द्र जी अपने द्वारा दिये गये वरदानों के कारण विवश थे और इसीलिये उन्हें जटायु को मोक्ष प्रदान करना पड़ा तथा उनका क्रिया कर्म भी करना पड़ा।

मर्यादा पुरुसोत्तम राम का जन्म

आदिकवि बाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामकथा में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिपादित कर एक महान सांस्कृतिक आधार प्रतिष्ठित किया था और उसके बाद अनेक प्रकार के राम कथा का स्वरूप विकसित होता रहा। जैन धर्मावलम्बियों ने अपने ढंग से इस कथा को प्रस्तुत किया और बाद में आने वाले रचनाकारों ने –हरि अनंत हरि कथा अनंता के आधार पर राम की कथा को उसके मूल्य की रक्षा करते हुए अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा को भक्ति का व्यावहारिक केन्द्रबिन्दु बना दिया। उनके राम भक्ति के आधार हैं और उनका जीवन ही अनुकरणीय है। गोस्वामी तुलसीदास के बाद भी राम कथा को विभिन्न रूपों में अनुभव किया जा रहा और जहाँ-जहाँ इस विराट भावभूमि में कवियों की दृष्टि में, जो स्थल मानवीय दृष्टि से उपेक्षित रह गये उन्हें केन्द्र बनाकर राम की कथा में अन्य आयाम जोड़ने को उपक्रम भी जारी रहा। रामकथा हमारे सामने जहाँ भक्ति का बहुत बड़ा मूल्य प्रस्तुत करती है वहां कुछ ऐसे प्रश्न छोड़ देती है। जिनका कोई तर्कपूर्ण समाधान शायद नहीं मिल पाता। और जब मन किसी बात को मानने से मना कर दे और उसका तर्कपूर्ण समाधान न हो तब एक गहरे रचनात्मक द्वन्द्व की रचना होती है। हमने रामकथा के विभिन्न पात्रों को उस कथा के मूल आदर्शवृत्त में ही रखकर मनन और अनुसंधान से, औपन्यासिक रूप में चितित्र करने का प्रयास किया है। क्योंकि, रामकथा के प्रत्येक पात्र किसी-न-किसी जीवनदृष्टि या जीवनमूल्य को भी प्रतिपादित करता है। राम यदि आदर्श पुत्र, पति हैं तो लक्ष्मण आदर्श भाई के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसी प्रकार अन्य पात्रों का मूल मूल्यवृत्त भी देखा जा सकता है। अब आधुनिक दृष्टि में यह मूल्यवृत्त कहां तक हमारे जीवन में रच सकता बहुत बड़ा प्रश्न है। और इसलिए किसी भी लेखक का यह रचनात्मक प्रयास कि पुराकथा के पात्रों में कोई मानसिक द्वन्द्व हो रहा होगा ‍? क्या उन्होंने सहज मानव के रूप में होठों को मुस्कराने की और आँखों को रोने की आज्ञा दी होगी ? और तब यह अनुभव करते हैं कि उस विराट मूल्य के आलोक में छोटा-सा मानवीय प्रकाशखण्ड उठाकर दृष्टिकोण से अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर सकें। रामगाथा के विशिष्ट पात्रों पर औपन्यासिक रचनावली के पीछे हमारा यही दृष्टिकोण रहा है कि हम उस विराट को अपनी दृष्टि से अपने लिए किस रूप में सार्थक कर सकते हैं।
गोस्वामीजी के शब्दों में-
सरल कवित, कीरति बिमल, सुनि आदरहिं सुजान।
सहज बैर बिसराय रिपु, जो सुनि करै बखान।।
और हम इस रास्ते पर यदि चल पाते तो चलने की सोच तो सकते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह रहा है कि जहां-जहां रामकथा के बड़े-बड़े ग्रन्थ कुछ नहीं बोलते वहां उसी चेतना में हम गद्य में कैसे उस अबोल के यथार्थ को चित्रित करें। पुराकथा की दृष्टि से जो सच हो सकता है और आधुनिक दृष्टि से जो स्वीकार भी हो सकता हो ऐसे कथातंत्रों को कल्पनाशीलता से रचते हुए हमारा हमेशा ध्यान रहा है कि मनुष्य के अन्तर का उदात्त भाव भी मुखर हो सके क्योंकि हमने जब-जब इन बड़े पात्रों से साक्षात्कार किया है तब-तब एक उदात्त तत्त्व की अलोक की तरह से दृष्टि के सामने आया है। उस आलोक में से थोड़ा-बहुत अब हमारी ओर से आपके सामने है।
सरयू नदी के किनारे बसा कोशल नाम से प्रसिद्ध एक बड़ा जनपद था। धन धान्य से संपन्न सभी लोग यहां हर प्रकार से सुखी थे। इस जनपद में ही समस्त लोकों में विख्यात अयोध्या नाम की नगरी थी। जिसे स्वयं महाराज मनु ने पुराकाल में बनवाया और बसाया था।यह सुंदर नगरी बारह योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी। सुंदर-सुन्दर फल देने वाले वृक्षों से सजा राजमार्ग, खिले हुए फूलों से लदे फूलदार पौधे उपवन की शोभा को बढ़ा रहे थे। बाहर से आनेवाले हर यात्री को यह नगरी देवराज इन्द्र की अमरावती के समान लगती थी। बड़े-बड़े फाटक, उन पर खड़े जागरुक पहरेदार भीतर अगल-अलग बाजार, शिल्पी और कलाकार, नाटक-मंडलियां, अप्सरा-सी नृत्यांनाएँ, ऊंची-ऊँची अट्टालिकाएं अयोध्या नगरी की शोभा को बढ़ाने वाले महत्त्वपूर्ण अंग थे। लगता था कि यह स्थान देवलोक की तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति भूमंडल में सर्वोच्च है। इसी स्वर्गीय छटावाली विशाल नगरी में अयोध्या अपनी इसी सुन्दरता के कारण कोशल की राजधानी थी। यहां कोई भी तो ऐसा नहीं था जो अग्निहोत्र या यज्ञ न करता हो। महाराज दशरथ के मंत्रिगण भी योग्य, विद्वान, आचरवान और राजा का प्रिय करने वाले थे। इसीलिए महाराज दशरथ की ख्याति की पताका दूर-दूर तक फैली हुई थी। महामुनि वसिष्ठ और वामदेव राज्य में मानवीय ऋत्विज थे। इनके अतिरिक्त भी गौतम, मार्कण्डेय, जबालि आदि भी सम्मान पाते थे। न्याय, धर्म और व्यवस्था के कारण राज्य में सभी को यथोचित सम्मान प्राप्त होता था। ऐसे गुणवान मंत्रियों के साथ रहकर अयोध्या के राजा दशरथ उस पृथ्वी पर शासन करते थे। उनका कोई शत्रु नहीं था सामन्त उनके चरणों में मस्तक झुकाते थे।
लेकिन सम्पूर्ण धर्मों को जानने वाले महात्मा राजा दशरथ फिर भी मन से बहुत चिंतित थे उनके वंश को चलानेवाला कोई पुत्र नहीं था। केवल एक पुत्री थी जिसका नाम शांता था। महाराज ने शांता का विवाह मुनि कुमार ऋष्य श्रृंग्य से कर दिया था। यह विभाण्डक मुनि के पुत्र थे।पुत्र की कामना जामाता के प्राप्त होने पर भी नहीं हुई और राजा की चिंता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही रही। एक दिन महाराज दशरथ ने विचार किया कि यदि अश्वमेध यज्ञ किया जाए तो अवश्य ही पुत्र की प्राप्ति हो सकती है। यह सोचकर महाराज ने विद्वान मंत्रियों और कुलपुरोहित वसिष्ठ, वामदेव तथा जाबालि आदि तपश्वियों को बुलाकर अपने मन की इच्छा को प्रकट करते हुए कहा। ‘‘मैं सदा पुत्र के लिए विलाप करता रहता हूँ। पुत्र के अभाव में यह राज्यसुख मेरे लिए निरर्थक होकर रह गया है इसलिए मैंने निश्चय किया है कि शास्त्र के अनुसार इस पावक यज्ञ का अनुष्ठान करूँ। आप सभी लोग गुणी महात्मा हैं। कृपया मुझे बताइए कि मेरी पुत्र प्राप्ति की इच्छा किस प्रकार पूर्ण होगी ?’’
‘‘यह तो बहुत अच्छा विचार है राजन् !’’ महामुनी वासिष्ठ ने उनका अनुमोदन करते हुए कहा और उनकी प्रशंसा की।
जबालि और वामदेव मुनियों ने, सुमंत्र आदि मंत्रियों ने भी इस पर अपनी प्रसन्नता प्रकट की और समर्थन करते हुए कहा, ‘‘महाराज ! यह बहुत उत्तम विचार है। इसके लिए शीघ्र ही यज्ञ-सामग्री का संग्रह किया जाए।’’
यज्ञ के लिए विचार करते हुए सरयू नदी के तट पर बनायी गई। भूमंडल में भ्रमण के लिए यज्ञ का अश्व छोड़ा गया और मुनि और मुनि कुमार ऋषि श्रृंग को यज्ञ का ब्रह्मा नियुक्त किया गया। महाराज दशरथ के इस पावक यज्ञ में वेद के अनेक पारंगत ब्राह्मण और ब्रह्मवादी ऋत्विज उपस्थित हुए।मुनि वसिष्ठ और ऋष्य श्रृंग दोनों के आदेश से शुभ नक्षत्रवाले दिन महाराज दशरथ ने अपनी पत्नी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा के साथ यज्ञ की दीक्षा ली। इस समय तक यज्ञ का अश्व भी भूमंडल में भ्रमण करके लौट आया था। इस यज्ञ में विधिवत आहुतियां दी गईं। सभी कार्य बिना बाधा और बिना भूल के सम्पन्न हुए। यज्ञ में प्रतिदिन अनेक ब्राह्मण भोजन करते थे, सभी को उनका यथा अनुरूप यज्ञोशेष प्राप्त होता था। अपने कुल की वृद्धि करनेवाले महाराज दशरथ ने यज्ञ पूर्ण होने पर होता को दक्षिणा रूप में अयोध्या से पूर्व दिशा का सारा राज्य सौंप दिया। अध्वर्यु को पश्चिम दिशा तथा ब्रह्मा को दक्षिण दिशा का राज्य दिया और उदगाता को उत्तर दिशा की सारी भूमि दान की। यह दान देकर महाराज दशरथ प्रसन्न हुए किन्तु ब्राह्मणों और पुरोहितों ने उनसे निवेदन किया, ‘‘हे महाराज ! हम तो वेदों का स्वाध्याय करते हैं, हम इस भूमि का क्या करेंगे। आप तो हे राजन ! हमें इस भूमि के मूल्य के समान कोई राशि दें, वही उपयोगी होगा।’’यह देखकर महाराज ने उन्हें गौएं और स्वर्ण मुद्राएं भेंट की। यज्ञ की समाप्ति पर महाराज दशरथ ने मुनी ऋष्य श्रंग से अपने लिए पुत्रप्राप्ति के लिए अनुष्ठान करने के लिए निवेदन किया।‘‘राजन ! इस कुल के भार को वहन करने में समर्थ आपके यहां चार पुत्र उत्पन्न होंगे।’’ यह कहते हुए महामुनी ऋष्य श्रंग ने अर्थववेद के मंत्रों से पुत्रेष्ठि यज्ञ का प्रारम्भ किया और विधि के अनुसार उसमें आहुतियां डालीं। जिससे उन्हें पुत्र प्राप्ति का बरदान मिला ।

Tuesday, October 21, 2008

नारी

भू्रणहत्या क्यों होती है? क्या बेटी को जन्म देना पाप है? क्या वर्तमान समय में बेटी को जन्म न देना चाहिए? क्या इस पुरूष प्रधान समाज में नारी का कोई स्थान नहीं है? क्या एक नारी एक पुरूष का स्थान नहीं ले सकती? ऐसे कई सवाल हमारे सामने हैं। आज एक नारी होकर दूसरी नारी को या बेटी को इस समाज में नहीं ला सकती। उसको इस दुनिया में लाने से पहले उसकी हत्या का पाप अपने सिर पर चढाती है। तब वह भूल जाती है कि मैं एक नारी हूं। अगर मेरी मां ने मुझे गर्भ में ही मार डाला होता तो? आज मैं यह पाप करने के लिए मौजूद नहीं होती।
मजबूरी से यह काम करते हैं तो उस मजबूरी का सामना करना चाहिए। क्योंकि इस संसार को आगे चलाना है तो नारी का अस्तित्व होना जरूरी है। क्योंकि स्त्री-पुरुष इस समाज के दो पहिए हैं। अगर एक पहिया टूट जाए तो वह आगे नहीं चल पायेगा। वर्तमान समय में नारी केवल अबला नहीं वह शक्ति है। उसने शक्ति बनकर साबित कर बताया है। आज के टेक्नोलाजी युग में नारी सब क्षेत्रों में आगे बढ़ी है। कोई भी क्षेत्र ले लो शिक्षा क्षेत्र, व्यवसायिक क्षेत्र या गृहउद्योग क्षेत्र महिलाएं पुरूषों से आगे निकल गयी हैं। आज हमारे सामने काफी सारे उदाहरण हैं। जैसे कि रानी लक्ष्मीबाई, मदर टेरेसा, कल्पना चावला, ये सब नारी ही हैं।
भू्रणहत्या करने से पहले सोचना चाहिए कि क्या बेटी महान व्यक्ति नहीं बन सकती? केवल पुरूष के पैरों तले दबकर उसकी हर एक सच्ची-झूठी बातें मानना नारी का काम नहीं। आज समय बदल गया है। क्योंकि मध्ययुग में नारी केवल चारदिवाली के अंदर रहती थी। वह अनपढ थी। इसलिए वह पुरूष प्रधान समाज में दब गयी थी और पति के जुल्म सहने को विवश थी। इसी सामाजिक और मानसिक थकान ने औरत को घरेलू बना दिया था।
लालची समाज ने दहेज के कारण कितनी सारी निर्दोष नारियों का भोग लिया। दहेज के कारण किनती नारियों ने अपनी जान दे दी और कितनी नारियाें की जान ले ली गयी। आज भ्रूणहत्या का कारण यह भी हो सकता है। दहेज देने से पहले इतना सोचो। नारी पर जुल्म गुजारने से पहले इतना सोचो कि अगर आपकी बेटी या बहन पर ऐसा जुल्म गुजारा जाए तो! वह नारी भी किसी की बहन या बेटी है। दहेज के दूषण ने नारी की होली जलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतना सारा दुख सहन करने के बाद भी वह उस घर की मान मर्यादा को औैर घर की इात को बचाकर रखती है।
इसीलिए नारी को शक्ति कहते हैं। क्योंकि वह जन्म से पिता की आज्ञा का पालन करके उसकी इात बनकर रहती है। बेटी को तो सिर्फ मूर्ति के समान खड़ा रहना पड़ता है और अपने को आनंद या खुशी देने के लिए खुद को कांटों वाले रास्ते पर चलना पड़ता है। जिस घर में उसने बीस साल बिताये उस घर को छोड़कर दूसरे घर को संभालने और उसकी इात बनकर एक फूल को संभाल कर दूसरे फूल की मान-मर्यादा बनकर उसे अच्छी तरह निभाने की कोशिश करती है। ऐसा कोई मर्द है या उसमें इतनी ताकत है जो अपने घर को छोड़कर दूसराें की खातिर किसी पराये की मर्यादा संभालने के लिए कोई पराये घर जाए!
नारी के कितने सारे रूप हैं। वह एक गुणवान बेटी बनकर अपने पिता के हर काम में और उसके कुल का नाम आगे बढ़ाने के लिए हर वक्त प्रयत्न करती रहती है। आज के समय में बूढे मां-बाप को सहारा बनने के लिए बेटी अपने सारे जीवन का बलिदान दे देती है। जब बेटे अपने मां-बाप को घर से बाहर निकाल देते हैं तब बेटी उस मां-बाप को अपने पास रख बेटी होने का फर्ज अदा करने की कोशिश करती है।
नारी का दूसरा रूप है एक आदर्श कु लवधू का। वह एक घर को छोड़कर दूसरे घर जब आती है तब त्याग और बलिदान की मूर्ति बनकर सबका प्रेम जीतने का प्रयत्न करती रहती है। वह अपने घर को और अपने रिश्तेदारों को एक जंजीर में बांध देती है। वह जंजीर से किसी को छूटने नहीं देती। एक देवी बनकर हर वक्त उसके कुल पर आफत न आये ऐसी ईश्वर से प्रार्थना करती है। वह दूसरे के साथ प्रेम कर्तव्य, फर्ज का रिश्ता जोड़ कर रहती है। वह नींव की ईट बनने का प्रयास करती है और अपना घर इस समाज में कंगूरा बने ऐसा चाहती है।
नारी का तीसरा रूप है एक बहन का। बहन खुद भूखी रहती है अपने भैया की लंबी आयुष्य की और सफल जीवन की कामना करती रहती है। तब एक भाई के पास अपनी बहन से मिलने का या दो बातें करने का वक्त नहीं होता। अपनी बहन की व्यथा को समझने के लिए वक्त नहीं होता। इसलिए भाई-बहन के अमर प्रेम को जिंदा रखने के लिए भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन और भैयादूज जैसे त्यौहार मनाए जाते हैं। भाई-बहन के बीच का प्यार बढ़े और उस रिश्ते में गहराई आए इसलिए आनंद के साथ दोनों दिन मनाये जाते हैं। दूसरे के लिए कुछ करने की भावना नारी में होती है।
नारी का चौथा रूप है पत्नी का। एक जीवन साथी एक हमसफर और अद्र्धांगिनी का। जो अपने जीवन साथी के साथ अपना सारा जीवन बिताने का वादा कर चुकी है। पति के दु:ख-सुख में साथ देने का वादा करती है। उस व्यक्ति को जिसे वह जानती तक नहीं। उस व्यक्ति पर विश्वास करके उसे अपने जीवन की बागडोर सौंप देती है। वह व्यक्ति उसके विश्वास का मजाक उड़ाता है। उसका एक मशीन समझकर उपयोग करता है। उसके धूप-छांव में साथ देने वाली अद्र्धांगिनी को वह कभी नहीं पूछता कि तुम्हारी इच्छा क्या है? एक नारी उस पुरूष के लिए अपना घर, घर के सदस्य और यहां तक कि अपना सरनेम भी छोड़कर चली आती है। तब पुरुष उसके ख्वाब को रंगीन बनाने के बदले उसे धूल में मिला देता है।
नारी का पांचवां रूप है मां का। जिसे हम ममता की मूरत कहते हैं। एक दूसरी जान को इस पृथ्वी पर लाना कोई छोटी बात नहीं है। वह काम एक नारी ही कर सकती है। बालक की मूक भाषा को समझकर वह हर एक इच्छा पूर्र्ण करने का प्रयत्न करती है। वहीं मां जब अपने बच्चे को चलना या पांव पर खड़ा होना नहीं आता तो उसे दौड़ना सिखाती है। जिस पैर पर उसे खड़ा रहना सिखाया वही पैर आज मां को लात मारते हैं। वही हाथ आज मां की उंगली पकड़ने के काम नहीं आती।
उक्त पांच रूप तो नारी के भावुकता, प्रेम और ममता के थे। लेकिन नारी जब महाकाली का रूप धारण करती है तब वह महिषासुर जैसे दानवों का संहार कर सकती है। जिस नारी में गुण, रूप, सुशील और संस्कार है उस नारी को यह समाज चंडिका बनने के लिए मजबूर कर दिया है। जो नारी आज किसी पर भी शेर की तरह हमला करके और उसका सर्वनाश करके ही वापस लौटती है। जब उसने अपना असली रूप दिखा दिया तो इस समाज में महिषासुर जैसे लोग जीवित नहीं रह पायेंगे। नारी त्यागी बनकर जी रही है। यही अच्छा है। जब उसने अपने नाखून बाहर दिखाये तो वह किसी का खून करके और पापियों का संहार कर के ही वापस लौटती है और वही नाखून पर वह नेल पालिश भी कर देती है और किसी भी को अपने जाल में फंसा सकती है।
आज की नारी समय के साथ बदल चुकी है। वह केवल अपने घर के साथ अपने बच्चों को ओर परिवार की जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि अपनी नौकरी भी करती है। वह समय के साथ कदम भर रही है लेकिन आज भी उस पर कम अत्याचार नहीं हो रहे। आज भी स्त्री का शोषण ज्यादा हो रहा है। जिस नारी पर बलात्कार हुआ है, उसी नारी को समाज शांति से रहने नहीं देता और उसकी इात लूटने वाला निर्दोषता का चेहरा लिए इस समाज में बेफाम घूमता है। ऐसे दानव को हमारा समाज क्यों दंड नहीं देता? अगर उसे सजा हो भी गई तो रिश्वत देकर भ्रष्टाचारी समाज में छूट कर वही रास्ता अपना लेते हैं। नारी का अनमोल आभूषण उसका शील है।
आज कितनी ही नारी हैं जिसने सफलता के आसमान पर अपने कदम रखे हैं। किरण बेदी जैसी नारी ने आज कितने सारे गुनहगारों का पकड़ा, उसे कैदी बनाया और उसे सही राह भी दिखाई। सजा देना आसान है। अपराधी को सजा ऐसी देनी चाहिए जिससे वह गलत रास्ता छोड़ दे, सही राह अपनाये। किरण बेदी ने कैदियों को छात्र बनाया और उन्हें रोजीरोटी मिल पाये इस काबिल बनाया।
अपनी जान की बाजी लगाकर अंतरिक्ष की सैर करने निकली सुनीता भी एक नारी ही है। वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपना दृढ मनोबल रखकर कुछ नया जानने के लिए प्रयत्न करती रहती है। क्या हम भी ऐसा अच्छा काम नहीं कर सकते?
नारी ने कुछ करने की ठान ली तो वह करके ही शांत होती है। अगर वह चाहे तो प्रगति के हर एक सोपान पर केवल नारी ही होगी। इसलिए नारी को नारायणी कहा गया है क्योंकि नारी केवल नींव की ईंट बनती है। एक सफल पुरूष के पीछे एक नारी का ही हाथ होता है। क्योंकि पुरूष की बुनियाद नारी है।

Monday, October 20, 2008

श्रीराम के चौदह निवास स्थान

प्रथम स्थान : जिन्ह के श्रवण समुद समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहि निरंतर होंइ न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुं गृह रूरे।। जिन लोगों के कान समुद्र के समान हैं, जिन्हें आपकी मनोहारी कथा रूपी नदियां निरंतर भरती रहती हैं, परंतु ऐसी स्थिति कभी नहीं आती कि वह जल नहीं चाहिए। वे कभी पूरे नहीं भरते। उनके हृदय आपके निवास के लिए अच्छे स्थान हैं। दूसरा स्थान : लोचन चातक जिन्ह कर राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाखे।। निदरहिं सरित, सिंधु, सर बारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। जिनके चातक रूपी नेत्र विशाल सरोवरों, नदियों और समुद्र के अपार जल को नकार कर आपके दर्शन रूपी मेघ की बूंद भर जल पाकर ही तप्त होते हैं, उनके हृदय सुख देने वाले घर हैं। भक्त तुलसीदास इसका ज्वलंत उदाहरण हैं: एक भरोसो, एक बल, एक आस बिस्वास। राम रूप स्वाती जलद चातक तुलसीदास।। तीसरा स्थान : जसु तुम्हार मानस विमल, हंसनि जीहा जासु। मुकताहल गुनगन चुनहिं, राम बसहु हिय तासु।। जिसकी हंसिनी रूपी जीभ आपके यश रूपी निर्मल मानसरोवर में आपके गुण रूपी मोतियों को चुगती रहती है, आप उसके हृदय में वास कीजिए। यह कीर्तन भक्ति है। चौथा स्थान : प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुवासा। सादर जासु लहइ नित नासा।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदय नहिं दूजा।। चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम, बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जिनकी नासिका सदा आदरपूर्वक आपकी प्रसादित सुंदर सुगंधि को सूंघती है। जो नित्य श्रीराम की पूजा करते हैं और केवल उन्हीं में उनका भरोसा है, जो श्रीराम के तीर्थ में पैदल चलकर जाते हैं, आप उनके मन में बसें। पांचवां स्थान : मंत्रराज नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहिं सहित परिवारा।। तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेंवाइ देहिं बहु दाना।। सब करि मांगहि एक फलु, राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु, सिय रघुनंदन दोउ।। हे श्रीराम, जो नित्य मंत्रों के राजा राम का जाप और परिवार सहित आपका पूजन करते हैं, जो तर्पण व होम करते हैं, ब्राह्मणों को भोजन व खूब दान देते हैं और जो केवल आपके चरणों में प्रीति का वर मांगते हैं, उनके हृदय रूपी मंदिर में आप निवास करें। छठा और सातवां स्थान : काम क्रोध मद मान न मोहा। लोभ न क्षोभ न राग न दोहा।। जिन्ह के कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया। कहहिं सत्य प्रिय वचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहिं छांडि़ गति दूसर नाहीं। राम बहसु तिन्ह के मन माहीं।। जो काम, क्रोध, मद, मान, मोह, लोभ तथा भय से रहित हैं, जिन्हें न किसी से प्रेम है न वैर, जिन्होंने कपट, दिखावा और माया से छुटकारा पा लिया है, अर्थात जिनका मन निर्मल है, आप उनके हृदय को अपना निवास बनाएं। और, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं, सोते, जागते आपकी शरण में हैं। आपको छोड़कर जिनकी दूसरी गति नहीं हैं। यथा : सो अनन्य जाके अस मति न टरहिं हनुमंत। मैं सेवक सचराचर स्वामि रूप भगवंत। आप उनके मन में वास करें। आठवां और नौवां स्थान : जननी सम जानहिं पर नारी। धनु पराव विष ते विष भारी। जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होइ पर विपति बिसेखी। जिन्हहिं राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे। स्वामि सखा पितु मातु गुरु, जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह के बसहु, सीय सहित दोउ भ्रात।। जो परायी स्त्रियों को माता जैसा मानते हैं और पराये धन को भयंकर विष, जो दूसरों की उन्नति पर प्रसन्न और विपत्ति पर विशेष प्रकार से दुखी होते हैं, उनके मन आपके लिए शुभ भवन हैं। और हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता तथा गुरु आदि सब केवल आप ही हैं, उनके मन मंदिर को आप अपना निवास बनाइए। दसवां और ग्यारहवां स्थान : अवगुन तजि सबके गुन गहहीं। बिप्र धेनुहित संकट सहहीं।। नीति निपुण जिन्ह के जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मन नीका।। गुन तुम्हार समझहिं निज दोसा। जेहि सब भांति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।। जो लोग 'संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार' की तर्ज पर सबके अवगुणों को छोड़ गुण ग्रहण करते हैं, ब्राह्माण और गौ के लिए कष्ट सह सकते हैं, नीति निपुणता जिनकी मर्यादा है, उनके अच्छे मन, हे राम! आपके लिए उत्तम घर हैं। जो यह समझता है कि जो कुछ उसके द्वारा अच्छा होता है, वह आपकी कृपा से होता है और जो उससे बिगड़ता है, वह उसके अपने दोष से बिगड़ता है। जिसे आप पर भरोसा है और राम भक्त प्रिय लगते हैं, ऐसे सज्जन के हृदय में आप विराजें। बारहवां और तेरहवां स्थान : जाति पांति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहिं रहइ उर लाई। तेहि के हृदय रहहु रघुराई।। सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहं तहं देखि धरे धनुबाना।। करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि के उर डेरा।। जो जाति-पांति, धन, धर्म, बड़ाई, प्रिय कुटुंब तथा खुशहाल घर छोड़कर केवल आप में ही लौ लगाए रहता है, आप उसके हृदय में रहें। और, जिनके लिए स्वर्ग, नरक व मोक्ष एक बराबर हैं और जो सब जगह आपको धनुष बाण धारण किए हुए ही देखते हैं और कर्म, वचन, तथा मन से आपके दास हैं, उनके हृदय में डेरा डालिए। चौदहवां स्थान : जाहि न चाहिअ कबहु कछु, तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन, सो राउर निज गेहु।। जो कभी भी कुछ चाहे बिना आपसे स्वाभाविक प्रेम करता है, उसके मन में आप निरंतर वास कीजिए। वह आपका अपना ही घर है। यह निष्काम भक्त का वर्णन है, जो वात्सल्य भक्ति का सूचक है।यह निष्काम भक्त का वर्णन है, जो वात्सल्य भक्ति का सूचक है।

वास्तुदोष में विघ्ननाशक गणपति की भूमिका

वास्तुपूजन के अवसर पर गणेश को प्रथम न्योता और पूजा जाता है। जिस घर में गणेश की पूजा होती है, वहां समृद्धि की सिद्धि होती है और लाभ भी प्राप्त होता है।
गणेश जी की स्थापना अपने भवन के द्वार के ऊपर और ईशान कोण में पूजा जा सकता है किंतु गणेश जी को कभी तुलसी नहीं चढ़ाएं। गणेश चतुर्थी पर विनायक की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाने से सुख मिलता है और चमकीला पन्ना चढ़ाने पर पूजक को आरोग्य मिलता है।
अन्य वास्तुप्रयोग >>>
>> यदि भवन में द्वारवेध हो तो वहां रहने वालों में उच्चटन होता है। भवन के द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि के होने पर द्वारवेध माना जाता है। ऐसे में भवन के मुख्य द्वार पर गणोशजी की बैठी हुई प्रतिमा लगानी चाहिए किंतु उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।
>> जिस रविवार को पुष्य नक्षत्र पड़े, तब श्वेतार्क या सफेद मंदार की जड़ के गणेश की स्थापना करनी चाहिए। इसे सर्वार्थ सिद्धिकारक कहा गया है। इससे पूर्व ही गणेश को अपने यहां रिद्धि-सिद्धि सहित पदार्पण के लिए निमंत्रण दे आना चाहिए और दूसरे दिन, रवि-पुष्य योग में लाकर घर के ईशान कोण में स्थापना करनी चाहिए।
>> घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा में हो तो अधिक उपयोगी होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।
>> संयोग से यदि श्वेतार्क की जड़ मिल जाए तो रवि-पुष्य योग में प्रतिमा बनवाएं और पूजन कर अपने यहां लाकर विराजित करें। गणोश की प्रतिमा का मुख नैर्ऋत्य मुखी हो तो इष्टलाभ देती है, वायव्य मुखी होने पर संपदा का क्षरण, ईशान मुखी हो तो ध्यान भंग और आग्नेय मुखी होने पर आहार का संकट खड़ा कर सकती है।
>> पूजा के लिए गणेश जी की एक ही प्रतिमा हो। गणोश प्रतिमा के पास अन्य कोई गणोश प्रतिमा नहीं रखें।
>> गणेश को रोजाना दूर्वा दल अर्पित करने से इष्टलाभ की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाकर समृद्धि की कामना से ऊं गं गणपतये नम: का पाठ लाभकारी माना जाता है।

रोगों में ग्रह योग की भूमिका

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।
वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।
इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।
इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।
कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।
अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।
चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को उदर समंधी समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।
चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

आत्मा / Soul

जिसका न आदि हो न अन्त तो उसकी कहानी का क्या होगी ? आत्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है आदि से अनन्त तक न आरम्भ, न ही अन्त तो फिर कैसी है यह कहानी ? यह कहानी है एक चक्र की चक्र, न जिसका आदि होता है न अन्त वैसे किसी भी स्थान को आदि मान सकते हैं, तब अन्त भी वही स्थान होगा, परन्तु एक अथवा अनेक चक्र पूरे करने के पश्चात इसके पश्चात नया चक्र , नयी कहानी तो आइये इस कहानी को आरम्भ करते हैं इस जीवन के बच‌पन से अथवा उससे भी पूर्व, जब माता के गर्भ में हमने पदार्पण किया जब हमने कुछ हलचल आरम्भ की उस हलचल को ही माता पिता ने जब जाना तो प्रसन्नता अनुभव‌ की हम बड़े होते गये हलचल बढ़ती गयी हम बाहर निकल आये, माता के गर्भ से - एक आघात सा लगा, अचानक परिवर्तन से - हम चिल्लाए यह चिल्लाना हमारे लिये लाभदायक सिद्ध हुआ, हम स्वस्थ प्राण को ग्रहण करने लग गये हम अब कुछ आत्म निर्भरता की और बढ़ने लगे करते करते हम बड़े हो गये अब हम हलचल करने, करवाने वाले बन गये न जाने कितनी प्रकार की हलचल कर पाने की क्षमता हमने प्राप्त कर ली तब धीरे धीरे जीवन समाप्ती की और बढ़ने लगा हलचल कम होने लगी हलचल की समाप्ती का भय हमें सताने लगा परन्तु एक दिन फिर आघात लगा और हम यह शरीर त्याग कर बाहर निकल गए हलचल करने वाला बाहर निकल गया, तो शरीर को भस्मीभूत कर दिया गया
हलचल जीवन है तो हलचल करने वाला - जीवनकर्त्ता या जीवन का प्रयोगकर्त्ता पर कौन है यह जीवन का प्रयोगकर्त्ता ? जीवन भर हम हलचल‌ पर हलचल‌ करते रहे, जाने में अथवा अंजाने में वास्तव में यही है हमारी उपस्थिती का प्रमाण हलचल ही आत्मा की और इसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिती का प्रमाण देती है अब हलचल ही हमारे जीवन की नियती है, तो कैसी हलचल हम करें ? हलचल किसमें और कैसे ? हलचल किसी भी जड़ पदार्थ अथवा चेतन सत्ता में हो सकती है जड़ वस्तु में हलचल में रहने की क्षमता तो है, पर स्वयं अपनी हलचल में स्वेच्छा से, बिना बाहरी हस्ताक्षेप के परिवर्तन करने की क्षमता नहीं है आत्मा के लिये यह सुलभ है परमात्मा स्वयं सर्वव्यापक है अत उसमे स्वयं में हलचल संभव नहीं, लेकिन वह सभी व्याप्त पदार्थों में हलचल करने की क्षमता से परिपूर्ण है परमात्मा की इसी हलचल करने की क्षमता के परिणाम स्वरूप इस सृष्टि का सृजन हुआ और उसी के अनन्त गुणो से यह अद्भुत‌ संसार और जीवन प्रगट हुए उसी सृष्टि का एक कण पाकर जीव भी हलचल करने के योग्य हो गया
बाल को बैट से मारने की लालसा बालक को बचपन से ही प्रतीत होती है, बस बाल व बैट उपलब्ध होने चाहिए अब हलचल तो हो पर लाभदायक हो, सुख देने वाली हो ऐसी न हो कि दुख ही दुख मिलते जायें ऐसी हलचल जो सृष्टी के रचयिता की सृष्टि रचना के समान सुखों से भरी हो बस यही है संक्षेप में आत्मा की कहानी, उसका उद्देश्य व सार - सुखों का मिलना और मिलते ही जाना समाप्त न होना कभी समाप्त न होना अब प्रश्न होगा, कैसे बनाएं यह कहानी सुन्दर सुखों से भरी तो सृष्टि का रचयिता जब उपलब्ध हो, उसे छोड़, विभिन्न उपायों को खोजना एक मूर्खता पूर्ण कार्य ही होगा अत‌: कहानी को सुंदर बनायें, और इसके लिये लें सहारा प्रभु के नाम का जो सदा सर्वत्र, हर स्थल पर व आपके तन मन में उपलब्ध रहता है, बस आवश्यक्त्ता है उसे स्वच्छ व जागरूक करने की इसका उपाय है प्रभु की दी दिव्य वाणी का जाप, मनन व चिंतन‌ वेद वाणी का जाप, परमात्मा के गुणो का जाप - ओउम् का जाप - मानसिक जाप, तन प्राण का जाप और आत्मिक जाप व प्रभु से मिलाप परमात्मा की विश्व व्यापी सत्ता की उपस्थिती, जिस नाम से मन में पगट हो, बस उसी का जाप, बस उसी का जाप

Saturday, October 18, 2008

King Dashrath passes away

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू ॥
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥ १ ॥
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥ २ ॥
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा ॥
सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥ ३ ॥
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ॥
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर ॥ ४ ॥
(दोहा)
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥ १५५ ॥

अयोध्या कांड

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू ॥
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥ १ ॥
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥ २ ॥
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा ॥
सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥ ३ ॥
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ॥
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर ॥ ४ ॥
(दोहा)
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥ १५५ ॥

शरीर में स्थित पंचकोष

मनुष्य की आत्मा पाँच कोशों के साथ संयुक्त है, जिन्हें पंचशरीर भी कहते हैं। ये पाँच कोश निम्नांकित हैं : 1. अन्नमय कोश : यह पांचभौतिक स्थूल शरीर का पहला भाग है। अन्नमय कोश त्वाचा से अस्थिपर्यन्त पृथ्वी-तत्त्व से सम्बन्धित है। आहार-विहार की सुचिता, आसन-सिद्ध और प्राणायाम करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है। 2. प्राणमय कोश : शरीर का दूसरा भाग प्राणमयकोश है। शरीर और मन के मध्य में प्राण माध्यम है। ज्ञान-कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही करता है। श्वासोच्छ्वास के रूप में भीतर-बाहर जाने-आनेवाला प्राण स्थान तथा कार्य के भेद से दस प्रकार का माना जाता है। जैसे-व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुख्य प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त गौण प्राण या उपप्राण हैं। प्राण मात्र का मुख्य कार्य है- आहार का यथावत् परिपाक करना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त तथा वितरित करते हुए देहेन्द्रियों का तर्पण करना, रक्त के साथ मिलकर देह में सर्वत्र घूम-घूमकर मलों का निष्कासन करना, जो कि देह के विभिन्न भागों में रक्त में आ मिलते हैं। देह के द्वारा भोगों का उपभोग करना भी इसका कार्य है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणमय कोश की कार्यशक्ति बढ़ती है।3. मनोमय कोश : सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रियाप्रधान भाग को मनोमय कोश कहते हैं। मनोमय कोश के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त हैं जिन्हें अन्तः-करणचतुष्टाय कहते हैं। पाँच कार्मेन्द्रियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध बाह्य जगत् के व्यवहार से अधिक रहता है। 4. विज्ञानमय कोश : सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग, जो ज्ञानप्रधान है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। इसके मुख्य तत्त्व ज्ञानायुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।

पंचप्राण की अवस्थिति तथा कार्य

1. प्राण : शरीर में कण्ठ से हृदय पर्यन्त जो वायु कार्य करता है, उसे ‘प्राण’ कहा जाता है। कार्य : यह प्राण नासिका-मार्ग, कण्ठ, स्वर-तन्त्र वाक्-इन्द्रिय, अन्न-नलिका, श्वसन-तन्त्र, फेफड़ों एवं हृदय को क्रियाशीलता तथा शक्ति प्रदान करता है2. अपान : नाभि के नीचे से पैर के अंगुष्ठ पर्यन्त जो प्राण कार्यशील रहता है, उसे ‘अपान’ प्राण कहते हैं। 3. उदान : कण्ठ के ऊपर से सिर पर्यन्त देह में अवस्थित प्राण को ‘उदान’ कहते हैं। कार्य : कण्ठ से ऊपर शरीर के समस्त अंगों-नेत्र, नासिका एवं सम्पूर्ण मुखमण्डल को ऊर्जा और आभा प्रदान करता है। पिच्युटरी तथा पिनियल ग्रन्थि-सहित पूरे मष्तिष्क को यह ‘उदान’ प्राण क्रियाशीलता प्रदान करता है। 4. समान : हृदय के नीचे से नाभि पर्यन्त शरीर में क्रियाशील प्राणवायु को ‘समान’ कहते हैं। कार्य : यकृत्, आँत, प्लीहा एवं अग्न्याशय-सहित सम्पूर्ण पाचन-तन्त्र की आन्तरिक कार्य-प्रणाली को नियन्त्रित करता है। 5. व्यान : यह जीवनी प्राण-शक्ति पूरे शरीर में व्याप्त है। शरीर की समस्त गतिविधियों को नियमित तथा नियन्त्रित करती है। सभी अंगों मांस-पेशियों, तन्तुओं, सन्धियों एवं नाड़ियों को क्रियाशीलता, उर्जा एवं शक्ति यही ‘व्यान प्राण’ प्रदान करता है। इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त शरीर में ‘देवदत्त’, ‘नाग’ ‘कृंकल’, ‘कूर्म’ एवं ‘धनंजय’ नामक पाँच उपप्राण हैं, जो क्रमशः छींकना, पलक झपकाना, जँभाई लेना, खुजलाना, हिचकी लेना आदि क्रियाओं को संचालित करते हैं। प्राणों का कार्य प्राणामय कोश से सम्बन्धित है और प्राणायाम इन्हीं प्राणों एवं प्राणमय कोश को शुद्ध, स्वस्थ और नीरोग रखने का प्रमुख कार्य करता है, इसलिए प्राणायाम का सर्वधिक महत्त्व और उपयोग भी है। प्राणायाम का अभ्यास शुरू करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि का परिज्ञान बहुत आवश्यक है।

प्राण के प्रकार

प्राण के प्रकार
प्राण साक्षात् ब्रह्म से अथवा प्रकृति-रूपी माया से उत्पन्न है। प्राण गत्यात्मक है। इस प्राण की गत्यात्मक सदागतिक वायु में पायी जाती है, अतः गौणी वृत्ति में वायु को प्राण कह देते हैं। शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु प्राण, अपान आदि नामों से व्यवहृत होता हैं। प्राण–शक्ति एक है। इसी प्राण को स्थान एवं कार्यों के भेद से विविध नामों से जाना जाता है। देह में मुख्य रूप से पाँच प्राण तथा पाँच उपप्राण हैं।

प्राण का अर्थ एवं महत्व


प्राण का अर्थ एवं महत्त्व
पंच तत्त्वों में से एक प्रमुख तत्त्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखती है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषों में से एक दोष है, जो श्वास के रूप में हमारा प्राण है।
पित्तः पंगुः कफः पंगुः पंगवो मलधातवः। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।। पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः। रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः (शांर्गधरसंहिताः 5।25-26)

पित्त, कफ, देह की अन्य धातुएँ तथा मल-ये सब पंगु हैं, अर्थात् ये सभी शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जा सकते। इन्हें वायु ही जहाँ-तहाँ ले जाता है, जैसे आकाश में वायु बादलों को इधर-उधर ले जाता है। अतएव इन तीनों दोषों-वात, पित्त एवं कफ में वात (वायु) ही बलवान् है; क्योंकि वह सब धातु, मल आदि का विभाग करनेवाला और रजोगुण से युक्त सूक्ष्म, अर्थात् समस्त शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करनेवाला, शीतवीर्य, रूखा, हल्का और चंचल है। उपनिषदों में प्राण को ब्रह्म कहा है। प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त है, शरीर के कर्मेन्द्रियादि तो सो भी जाते हैं, विश्राम कर लेते हैं, किन्तु यह प्राण-शक्ति कभी न सोती है, न विश्राम ही करती है। रात-दिन अनवरत रूप में कार्य करती ही रहती है, चलती ही रहती है-‘चरैवेति चरैवेति’ यही इसका मूलमन्त्र है। जबतक प्राण-शक्ति चलती रहती है, तभी तक प्राणियों की आयु रहती है। जब यह इस शरीर में काम करना बन्द कर देती है, तब आयु समाप्त हो जाती है। प्राण जबतक कार्य करते रहते हैं, तभी तक जीवन है, प्राणी तभी तक जीवित कहलाता है। प्राण-शक्ति के कार्य बन्द करने पर वह मृतक कहलाने लगता है। शरीर में प्राण ही तो सब कुछ है। अखिल ब्रह्माण्ड में प्राण सर्वाधिक शक्तिशाली एवं उपयोगी जीवनीय तत्त्व है प्राण के आश्रय से ही जीवन है। प्राण के कारण ही पिण्ड (देह) तथा ब्राह्माण्ड की सत्ता है। प्राण की अदृश्य शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व का संचालन हो रहा है। हमारा देह भी प्राण की उर्जा-शक्ति से क्रियाशील होता है। हमारे अन्नमय कोश (PHYSIKAL BODY) तथा दृश्य शरीर भी प्राणमय कोश (ETHRICAL BODY) की अदृश्य शक्ति से संचालित होता है। अहार के बिना व्यक्ति वर्षों जीवित रह सकता है, परन्तु प्राण-तत्त्व के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। प्राणिक ऊर्जा (ओरा) ही हमारी जीविनी-शक्ति तथा रोग- प्रतिरोधक शक्ति का आधार है। सभी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थियों (GLANDS), हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क एवं मेरूदण्ड-सहित सम्पूर्ण शरीर को प्राण ही स्वास्थ्य एवं ऊर्जावान् बनाता है। प्राण की ऊर्जा से ही आँखों में दर्शन-शक्ति, कानों में श्रवण-शक्ति, नासिका में घ्राण-शक्ति, वाणी में सरसता, मुख पर आभा, ओज एवं तेज, मस्तिष्क में ज्ञान-शक्ति एवं उदर में पाचन-शक्ति कर्यरत रहती है। इसलिए उपनिषदों में ऋषि कहते हैं :
प्राणस्येदं वशे सर्वं यत् त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति।।
(प्रश्नोपनिषद्:2.13)पृथिवी, द्यु तता अन्तरिक्ष तीन लोकों में जो कुछ भी है, वह सब प्राण के वश में है। हे प्राण ! जैसे माता स्नेहाभाव से पुत्रों की रक्षा करती है, ऐसे ही तू हमारी रक्षा कर। हमें श्री (भौतिक सम्पदा) तथा प्रज्ञा (मानसिक एवं आत्मिक ऐश्वर्य) प्रदान कर।

Friday, October 17, 2008

इसे पढ़ें ( इतिहास के कुछ पन्ने )

लॉर्ड कर्ज़न भारत का वाइसराय बनकर आया तो उसने कुछ अच्छे काम भी किये। सर्वप्रथम उसने देश में पुरातत्त्व-विभाग खोला था। सब प्राचीन भवनों को सुरक्षित स्मारक घोषित कर, उनकी मरम्मत इत्यादि का उसने प्रबन्ध कराया। यद्यपि इससे देश का भारी कल्याण हुआ है, परन्तु कर्ज़न साहब की नीयत देश का कल्याण करने की नहीं थी। लॉर्ड कर्ज़न हिन्दुओं से अत्यन्त घृणा करता था और समझता था कि इन स्मारक भवनों की रक्षा करके, वह इस्लामी राज्य की हिन्दुस्तान में प्रभुता की रक्षा कर रहा है। उसको यह आशा नहीं थी कि निकट भविष्य में ही ऐसे लोग उत्पन्न हो जायेंगे, जो इन भवनों के इस्लाम से सम्बन्ध के विषय में चुनौती देकर यह सिद्ध कर देंगे कि ये भवन, हिन्दू राजाओं द्वारा ही निर्मित हैं।लॉर्ड कर्ज़न के काल तक भारत सरकार की हिन्दू और मुसलमानों में वैमनस्य डालने की नीति, ज़ोरों से चलने लगी थी। बंगाल का विभाजन कर पूर्वी पाकिस्तान बनाने का प्रथम प्रयास कर्ज़न ने ही किया था। उसके विचार से पूर्वी बंगाल में ढाका का क्षेत्र और समूचा भी सम्मिलित होना चाहिये था। इस प्रकार बंगाल का यह क्षेत्र अलग करके भी, वह उसे हिन्द की सरकार के अधीन ही रखना चाहता था।लार्ड कर्ज़न हिन्दू-मुसलमानों में द्वेष उत्पन्न कर हिन्दुस्तान के टुकड़े-टुकड़े करना चाहता था और फिर उन टुकड़ों पर ब्रिटेन की प्रभुसत्ता बनाये रखना चाहता था। हिन्दू इस नीति को समझते थे और इसका विरोध करने लगे थे।ब्रिटिश सरकार की इस नीति का विरोध हिन्दू दो प्रकार से करने लगे थे। एक ओर हिंसात्मक क्रान्तिकारी आन्दोलन का श्रीगणेश किया गया तथा दूसरी ओर सरकार-भक्तों ने अधिक और अधिक सरकार की मिन्नत-खुशामद करनी आरम्भ कर दी।नलिनीकान्त सरकार की मिन्नत-खुशामद करने वाले लोगों को देशवासियों के मनों में विकृति उत्पन्न करने वाले मानता था। अतः जब भी उसे अवसर मिलता, वह सदा सरकार-भक्तों की आलोचना करता रहता था।ऐसा ही एक आलोचनात्मक व्याख्यान ‘आर्य युवक समाज’ के प्रधान बिहारी-लाल ने सुना था। यह व्याख्यान नलिनी ने आर्य-समाज के साप्ताहिक सत्संग में दिया था और इसमें उसने स्वामी जी के राजनीतिक विचारों पर प्रकाश डाला था। इस व्याख्यान में उसने कहा था—‘‘इण्डियन नैशनल कांग्रेस ब्रिटिश सरकार की योजना का ही एक बालक है। ब्रिटिश सरकार ने पहले इण्डियन नैशनल कांग्रेस के लिये घटक तैयार किये। वर्तमान कालेजों के स्नातक ही वे घटक हैं, और इन घटकों का सक्रिय भाग ही इण्डियन नैशनल कांग्रेस है।‘‘मैकॉले साहब की योजना आंशिक रूप में ही सफल हो सकी थी। अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे ईसाई तो नहीं हुए, परन्तु वे हिन्दू और हिन्दुस्तानी भी नहीं रहे।’’नलिनी ने बाबू सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी के अध्यक्षीय भाषण से कुछ वाक्य सुनाये थे। ये वाक्य उन्होंने अहमदाबाद कांग्रेस वार्षिक अधिवेशन पर कहे थे। बाबू सुरेन्द्र बैनर्जी ने कहा था—‘‘We plead for the permenance of British rule in India.’’नलिनीकान्त का कहना था कि यह मानसिक अवस्था सरकारी शिक्षा-पद्धति की उपज है। आर्य-समाज ने मैकॉले की शिक्षा में से डंक निकालने का यत्न किया है। इसने डी. ए. वी. स्कूल और कॉलेज खोल कर ब्रिटिश सरकार के लिये वह भक्ति, जिसका प्रदर्शन कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में ब्रिटिश राष्ट्र-गीत गाकर तथा ‘ब्रिटिश सम्राट चिरजीवी हो’ के नारे लगाकर किया जाता है, मिटाने का सफल यत्न किया है। इस पर भी हम अनुभव कर रहे हैं कि डी. ए. वी. कालेज देशभक्त तथा अपने धर्म और अपनी संस्कृति के लिये त्याग तथा तपस्या करने वाले लोग उत्पन्न करने में सफल हो रहा प्रतीत नहीं होता।डी. ए. वी. कालेज के स्नातक ब्रिटिश सरकार के विरोधी तो कदाचित् हो जायेंगे, परन्तु वे किस विचार-पद्धति के पोषक होंगे, अभी कहना कठिन है। सम्भवतः वे हिन्दू होंगे, परन्तु बिना हिन्दू-धर्म और हिन्दू संस्कृति के विषय में दर्शन ‘अ-आ’ का ज्ञान प्राप्त किये। वे आर्य भी हो सकते हैं, परन्तु रहन-सहन तथा विचारों में पूर्णतः इंग्लैण्ड निवासी बन कर। वे महर्षि स्वामी दयानन्द के गुणानुवाद गायेंगे, परन्तु मैक्समूल्लर के विचारों को, स्वामी जी के विचार मानते हुए। वे शिवाजी तथा राणा प्रताप की कीर्ति गान करेंगे, परन्तु घरों में एक चूहा देख कर भयभीत होते हुए।’’नलिनी के इतने तीखे वाक्यों से डी. ए. वी. कालेज के प्रिन्सिपल और अनारकली आर्य-समाज तथा प्रादेशिक आर्य-समाज के प्रधान के मन पर गहरी चोट लगी थी।अधिवेशन के उपरान्त ही आर्य-समाज के प्रधान के मन्त्री को बुला कर पूछा, ‘‘वैद्य जी ! यह आपने आज किस पागल को व्याख्यान के लिये खड़ा कर दिया था ?’’मन्त्री महोदय नगर में आयुर्वेद की चिकित्सा कार्य करते थे और हम चाहते हैं कि १-हिन्दुस्तान में ब्रिटिश राज्य सदा बना रहे।आयुर्वेदी फार्मेसी के संचालक थे। नाम था लाला सरदारीलाल। वैद्य जी ने तो समय की गति का ध्यान रख कर ही वक्ता का चयन किया था। देश में सन् 1898 से एक नयी लहर उत्पन्न हुई थी। इससे पहले सरकार के विपरीत सेना में छोटे-मोटे विस्फोट होते रहते थे और एक स्थान पर गाँव वालों ने भी विद्रोह किया था, परन्तु सन् 1898 में पूना के चाफेकर भाइयों ने एक नयी परम्परा डाली थी। उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों को पिस्तौल की गोली का आखेट बनाया था। इस घटना ने देश में सन् 1857 के विद्रोह से भी अधिक हलचल उत्पन्न की थी। यह आतंकवाद था और यह समझ कि आततायी महाभीरु होता है, आतंकवादियों ने ब्रिटिश सरकार के लिये कफन तैयार करना आरम्भ किया था।सैनिक-संघर्ष में सेनाओं का युद्ध होता है। जिसकी सेना संख्या में अधिक और बढ़िया शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होती है, उसकी विजय होती है। परन्तु इस प्रकार के युद्ध में, जहाँ एक व्यक्ति अपनी जान को हथेली पर लिये हुए दूसरे पर आक्रमण करता है, वहाँ न तो संख्या का प्रश्न उठता है और न ही बढ़िया शस्त्रास्त्रों का। वहाँ तो साहस और विचार-दृढ़ता का प्रश्न ही होता है। आततायी विचार से सदा दुर्बल और भीरु होते हैं। ऐसे ही हिन्दुस्तान में अंग्रेज थे और केवल दो की हत्या से, पेशावर से लेकर कन्याकुमारी तक अंग्रेज़ अफसरों की रात के समय की नींद खराब होने लगी थी। तथा ब्रिटिश पार्लियामेण्ट इस घटना पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगी थी।इस कार्य को और इसकी प्रतिक्रिया को देख, हिन्दुस्तानी युवकों का साहस बढ़ रहा था और स्थान-स्थान पर आतंक उत्पन्न करने के लिये, क्रान्तिकारी दल बन रहे थे।लाहौर में भी ‘भारत माता’ के नाम से एक संस्था बनी थी। यह संस्था युवकों की मनोवृत्ति बदलने का यत्न करने में लगी हुई थी।पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र और एक सीमा तक मद्रास में भी यह कार्य होने लगा था।इस आन्दोलन में असाधारण आर्य-समाजी बहुत रुचि ले रहे थे; परन्तु आर्य-समाज में भी कुछ नेता ऐसे थे, जो स्वयं को, मठाधीशों के समान, निहित हितों के स्वामी मानने लगे थे। वे इस आन्दोलन से भयभीत थे। वास्तव में वे भी मैकॉले साहब की शिक्षा की उपज थे और उन्हें भी ‘इण्डियन नैशनल कांग्रेस’ के नेताओं की भाँति नये क्रान्तिकारी आन्दोलन से भय उत्पन्न होने लगा था।आर्य-समाज के प्रधान के मन में यही भावना थी।

shakuntala / शकुन्तला

शकुन्तला में कालिदास का सबसे बड़ा चमत्कार उसके ध्वन्यात्मक संकेतों में है। इसमें कवि को विलक्षण सफलता यह मिली है कि उसने कहीं भी कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं कही। कोई भी पात्र, कोई भी कथोप-कथन, कोई भी घटना, कोई भी प्राकृतिक दृश्य निष्प्रयोजन नहीं है। सभी घटनाएं यह दृश्य आगे आने वाली घटनाओं का संकेत चमत्कारिक रीति से पहले ही दे देते हैं। नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है। इसी प्रकार नाटक के प्रारम्भिक गीत में भ्रमरों द्वारा शिरीष के फूलों को ज़रा-ज़रा-सा चूमने से यह संकेत मिलता है कि दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन अल्पस्थायी होगा। जब राजा धनुष पर बाण चढ़ाए हरिण के पीछे दौड़े जा रहे हैं, तभी कुछ तपस्वी आकर रोकते हैं। कहते हैं-‘महाराज’ यह आश्रम का हरिण है, इस पर तीर न चलाना।’ यहां हरिण के अतिरिक्त शकुन्तला की ओर भी संकेत है, जो हरिण के समान ही भोलीभाली और असहाय है। ‘कहां तो हरिणों का अत्यन्त चंचल जीवन और कहां तुम्हारे वज्ज्र के समान कठोर बाण !’ इससे भी शकुन्तला की असहायता और सरलता तथा राजा की निष्ठुरता का मर्मस्पर्शी संकेत किया गया है। जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रेम कुछ और बढ़ने लगता है, तभी नेपथ्य से पुकार सुनाई पड़ती है कि ‘तपस्वियो, आश्रम के प्राणियों की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ। शिकारी राजा दुष्यन्त यहां आया हुआ है।’ इसमें भी दुष्यन्त के हाथों से शकुन्तला की रक्षा की ओर संकेत किया गया प्रतीत होता है, परन्तु यह संकेत किसी के भी कान में सुनाई नहीं दिया; शकुन्तला को किसी ने नहीं बचाया। इससे स्थिति की करुणाजनकता और भी अधिक बढ़ जाती है। चौथे अंक के प्रारम्भिक भाग में कण्व के शिष्य ने प्रभात का वर्णन करते हुए सुख और दुःख के निरन्तर साथ लगे रहने का तथा प्रिय के वियोग में स्त्रियों के असह्य दुःख का जो उल्लेख किया है, वह दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला का परित्याग किए जाने के लिए पहले से ही पृष्ठभूमि-सी बना देता है। पांचवें अंक में रानी हंसपदिका एक गीत गाती हैं, जिसमें राजा को उनकी मधुर-वृत्ति के लिए उलाहना दिया गया है। दुष्यन्त भी यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हंसपदिका से एक ही बार प्रेम किया है। इससे कवि यह गम्भीर संकेत देता है कि भले ही शकुन्तला को दु्ष्यन्त ने दुर्वासा के शाप के कारण भूलकर छोड़ा, परन्तु एक बार प्यार करने के बाद रानियों की उपेक्षा करना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। अन्य रानियां भी उसकी इस मधुकर-वृत्ति का शिकार थीं। हंसपादिका के इस गीत की पृष्ठभूमि में शकुन्तला के परित्याग की घटना और भी क्रूर और कठोर जान पड़ती है। इसी प्रकार के ध्वन्यात्मक संकेतों से कालिदास ने सातवें अंक में दुष्यन्त, शकुन्तला और उसके पुत्र के मिलने के लिए सुखद पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। इन्द्र राजा दुष्यन्त को अपूर्व सम्मान प्रदान करते हैं। उसके बाद हेमकूट पर्वत पर प्रजापति के आश्रम में पहुंचते ही राजा को अनुभव होने लगता है कि जैसे वह अमृत के सरोवर में स्नान कर रहे हों। इस प्रकार के संकेतों के बाद दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन और भी अधिक मनोहर हो उठता है।

boss ki official dadagiri

ऑफिस में बॉस द्वारा दिखाई जाने वाली ‘दादागीरी” अथवा कडक स्वभाव मानव के प्राग ऐतिहासिक स्वभाव पर आधारित है.
ऑस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय ने अपनी शोध मे पाया कि इतने साल बीत जाने के बावजूद कुछ ऐसे लक्षण हैं जो मानव आज भी प्रदर्शित करता है. ऑफिस में बॉस द्वारा अपनी ही बात के सही होने का आग्रह रखना और कर्मचारियों से सख्ती से पेश आना उसी स्वभाव का एक हिस्सा है
प्राग ऐतिहासिक मानव अपने इलाके की रक्षा के करने के लिए दूसरों पर अपना प्रभाव प्रदर्शित करता था, और दूसरों को अपने द्वारा तय किए गए मानदंड मानने के लिए मजबूर करता था.
आज करोडों साल बाद भी मानव का यह स्वभाव उसके साथ रहता है. एक निश्चित पद पर आने के बाद व्यक्ति अपने अधीन लोगों पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करने लगता है. और इसके लिए और कोई नहीं भूतकाल के उसके पूर्वजों का व्यवहार जिम्मेदार होता है

बदला करवा चौथ का स्वरूप


दिनभर उपवास के बाद शाम को 18 साल की लड़की से लेकर 75 साल की महिला नई दुल्हन की तरह सजती-सँवरती है, पूजा के साथ-साथ मिलना-मिलाना और अपने दाम्पत्य की दीप्ति... चाँद को देखती है और फिर अपने चाँद से पति। एक खूबसूरत रिश्ता जो साल-दर-साल मजबूत होता है, करवा चौथ के दिन...। कुँवारी लड़कियाँ (कुछ संप्रदायों में, सगाई के बाद) शिव की तरह के पति की चाहत में, तो शादीशुदा स्त्रियाँ अपनी पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं। परंपरा में सौन्दर्य का समावेश तब होता है, जब पति भी व्रत करते हैं। परंपरा में एक वैल्यू एडीशन होता है और दाम्पत्य में जुड़ाव के लिए बना यह चलन और पक्का हो जाता है। हमारी परंपराएँ सनातन काल से चली आ रही हैं, अब तो इन्हें केवल लोक-परंपरा भी नहीं कहा जा सकता है, इनका रिश्ता पौराणिकता से जो है, लेकिन हमारे समाज की खासियत यह है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश करते रहते हैं, कभी करवा चौथ पत्नी के पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की उष्मा से दमक और महक रहा है। कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर उत्तर भारतीय परिवारों, खासकर उत्तरप्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्यप्रदेश में इसे पूरी परंपरा और उल्लास से मनाया जाता है। शिव-पार्वती युगल हमारे पौराणिक साहित्य के सबसे आदर्श और सबसे आकर्षक युगल हैं। और इसीलिए हमारे यहाँ पति-पत्नी के बीच के सारे पर्व और त्योहार इन्हीं पति-पत्नी से जुड़े हुए हैं। चाहे वह हरतालिका तीज हो, मंगलागौरी, जया-पार्वती हो या फिर करवा चौथ ही क्यों न हो? अपने पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए किया जाने वाला यह व्रत हर विवाहित स्त्री के जीवन में एक नई उमंग लाता है। कुँवारी लड़की अपने लिए शिव की तरह प्रेम करने वाले पति की कामना करती है और इसके लिए सोमवार से लेकर जया-पार्वती तक के सभी व्रत पूरी आस्था से करती है। इसी तरह करवा चौथ का संबंध भी शिव और पार्वती से है।

Thursday, October 16, 2008

सीता माता की खोज

अब हनुमान इस बात पर विचार करने लगे कि मैं सीता के सामने किस प्रकार प्रकट हो कर उन्हें रामचन्द्र जी की अँगूठी दे कर धैर्य बँधाऊँ। इन दुष्ट राक्षसनियों के रहते मैं apne मनोरथ में सफल नहीं हो सकता। फिर रात्रि भी लगभग समाप्त होती जा रही है। यदि इसी सोच-विचार में सूर्य निकल आया तो मैं कुछ भी नहीं कर सकूँगा। जो कुछ मुझे करना है उसका उपाय मुझे शीघ्र ही सोच डालना चाहिये। यदि किसी कारणवश मैं सीता से न मिल सका तो मेरा सारा प्रयत्न निष्फल हो जायेगा। रामचन्द्र और सुग्रीव को सीता के यहाँ उपस्थित होने का समाचार देने से भी कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि इनकी दुःखद दशा को देखते हुये यह नहीं कहा जा सकता कि ये किस समय निराश हो कर अपने प्राण त्याग दें। इसलिये उचित यह होगा कि इन सनसे दृष्टि बचा कर मैं जानकी से वार्तालाप करने का प्रयास करूँ, चाहे वह वार्तालाप संकेतों में ही क्यों न हो। इस प्रकार निश्चय करके हनुमान मन्द-मन्द मृदु स्वर में आर्य भाषा में, जो राक्षस समुदाय के लिये एक अपरिचित bhasha थी, बोलने लगे - "इक्ष्वाकुओं के कुल में परमप्रतापी, तेजस्वी, यशस्वी एवं धन-धान्य समृद्ध विशाल पृथ्वी के स्वामी चक्रवर्ती महाराज दशरथ हुये हैं। उनके ज्येष्ठ पुत्र उनसे भी अधिक तेजस्वी, परमपराक्रमी, धर्मपरायण, सर्वगुणसम्पन्न, अतीव दयानिधि श्री रामचन्द्र जी अपने पिता द्वारा की गई प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ जो उतने ही वीर, पराक्रमी और भ्रातृभक्त हैं, चौदह वर्ष की वनवास की अवधि समाप्त करने के लिये अनेक वनों में भ्रमण करते हुये चित्रकूट में आकर निवास करने लगे। उनके साथ उनकी परमप्रिय पत्नी महाराज जनक की लाड़ली सीता जी भी थीं। वनों में ऋषि-मुनìयों को सताने वाले राक्षसों का उन्होंने सँहार किया। लक्ष्मण ने जब दुराचारिणी शूर्पणखा के नाक-कान काट लिये तो उसका प्रतिशोध लेने के लिये उसके भाई खर-दूषण उनसे युद्ध करने के लिये आये जिनको रामचन्द्र जी ने मार गिराया और उस जनस्थान को राक्षसविहीन कर दिया। जब लंकापति रावण को खर-दूषण की मृत्यु का समाचार मिला तो वह अपने मित्र मारीच को ले कर छल से जानकी का हरण करने के लिये पहुँचा। मायावी मारीच ने एक स्वर्ण मृग का रूप धारण किया, जिसे देख कर जानकी जी मुग्ध हो गईं। उन्होंने राघवेन्द्र को प्रेरित कर के उस माया मृग को पकड़ कर या मार कर लाने के लिये भेजा। दुष्ट मारीच ने मरते-मरते राम के स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहा था। जानकी जी भ्रम में पड़ गईं और लक्ष्मण को राम की सुधि लेने के लिये भेजा। लक्ष्मण के जाते ही रावण ने छल se सीता का अपहरण कर लिया। लौट कर राम ने जब सीता को न पाया तो वे वन-वन घूम कर सीता की खोज करने लगे। मार्ग में वानरराज सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई। मुग्रीव ने अपने लाखों वानरों को दसों दिशाओं में जानकी जी को खोजने के लिये भेजा. मुझे भी आपको खोजने का काम सौंपा गया। मैं चार सौ कोस चौड़े सागर को पार कर के यहाँ पहुँचा हूँ। श्री रामचन्द्र जी ने जानकी जी के रूप-रंग, आकृति, गुणों आदि का जैसे वर्णन किया था, उस शुभ गुणों वाली देवी को आज मैंने देख लिया है।" यह कर कर हनुमान चुप हो गये। राम के वियोग में तड़पती हुई सीता के कानों में जब हनुमान द्वारा सुनाई गई यह अमृत कथा पहुँची तो वे विस्मय से चौंक उठीं। इस राक्षस पुरी में राम की पावन कथा सुनाने वाला कौन आ गया? उन्होंने apne मुखमण्डाल पर छाई हुई केश-राशि को हटा कर चारों ओर देखा, परन्तु उस कथा को सुनाने वाले व्यक्ति को वे नहीं देख सकीं। उन्हें यह तो आभास हो रहा था कि यह स्वर उन्होंने उसी वृक्ष पर से सुना है जिसके नीचे वे खड़ी थीं। उन्होंने फिर ध्यान से ऊपर की ओर देखा। बड़े ध्यान से देखने पर उन्हें वृक्ष की घनी पत्तियों में छिपी हनुमान की तेजस्वी आकृति दिखाई दी। उन्होंने कहा, "भाई! तुम कौन हो? नीचे उतर कर मेरे सम्मुख क्यों नहीं आते?"सीता का निर्देश पाकर हनुमान वृक्ष से धीरे-धीरे नीचे उतरे और उनके सामने आ हाथ जोड़ कर बोले, "हे देवि! आप कौन हैं जो मुझसे वार्तालाप करना चाहती हैं? आपका कोमल शरीर सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होने योग्य होते हुये भी आप इस प्रकार का नीरस जीवन व्यतीत कर रही हैं। आपके अश्रु भरे नेत्रों से ज्ञात होता है ki आप अत्यन्त दुःखी हैं। आपको देख कर ऐसा प्रतीत होता है किस आप आकाशमण्डल से गिरी हुई रोहिणी हैं। आपके शोक का क्या कारण है? कहीं आपका कोई प्रियजन स्वर्ग तो नहीं सिधार गया? कहीं आप जनकनन्दिनी सीता तो नहीं हैं जिन्हें लंकापति रावण जनस्थान से चुरा लाया है? जिस प्रकार आप बार-बार ठण्डी साँसें लेकर 'हा राम! हा राम!' पुकारती हैं, उससे ऐसा अनुमान लगता है कि आप विदेहकुमारी जानकी ही हैं। ठीक-ठीक बताइये, क्या मेरा यह अनुमान सही है?"हनुमान का प्रश्न सुन कर सीता बोली, "हे वानरराज! तुम्हारा अनुमान अक्षरशः सही है। मैं जनकपुरी के महाराज जनक की पुत्री, अयोध्या के चक्रवर्ती महाराज दशरथ की पुत्रवधू तथा परमतेजस्वी धर्मात्मा श्री रामचन्द्र जी की पत्नी हूँ। जब श्री रामचन्द्र जी अपने पिता की आज्ञा से वन में निवास करने के लिये आये तो मैं भी उनके साथ वन में आ गई थी। वन से ही यह दुष्ट पापी रावण छलपूर्वक मेरा अपहरण करके मुझे यहाँ ले आया। वह मुझे निरन्तर यातनाएँ दे रहा है। आज भी वह मुझे दो मास की अवधि देकर गया है। यदि दो मास के अन्दर मेरे स्वामी ने मेरा उद्धार नहीं किया तो मैं अवश्य प्राण त्याग दूँगी। यही मेरे शोक का कारण है। अब तुम मुझे कुछ अपने विषय में बताओ।सीता जी के परिचय से सन्तुष्ट होकर हनुमान हाथ जोड़ कर बोले, "हे देवि! मैं श्री रामचन्द्र जी का संदेशवाहक हनुमान हूँ। आपको खोजता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा हूँ। महाराज दशरथ के दोनों पुत्र श्री रामचन्द्र और लक्ष्मण कुशलपूर्वक हैं। रामचन्द्र जी केवल आपके वियोग में दुःखी और शोकाकुल रहते हैं। उन्होंने mere द्वारा आपके पास अपना कुशल समाचार भेजा है और तेजस्वी लक्ष्मण जी ने आपके चरणों में अपना अभिवादन कहलाया है।" पवनसुत से अपने पूज्य पति और स्नेहमय देवर का कुशल समाचार पाकर जानकी का मुर्झाया हुआ हृदयकमल खिल उठा। विषादग्रस्त मुखमण्डल पर आशा की किरणें उद्भासित होने लगीं। इस अप्रत्याशित सुखद समाचार ने उनके मृतप्राय शरीर में नवजीवन का संचार किया। तभी अकस्मात् सीता को ध्यान आया कि राम दूत कहने वाला यह वानर कहीं मायावी रावण का गुप्तचर न हो जिसे उसने मुझे भुलावे में डालने के लिये मेरे पास भेजा हो। यह सोच कर वह वृक्ष की शाखा छोड़ कर पृथ्वी पर चुपचाप बैठ गईं। सीता के इस व्यवहार से ह瓥नुमान समझ गये कि इन्हें मुझ पर सन्देह हो गया है। इसीलिये वार्तालाप करते-करते ये मौन हो कर पृथ्वी पर बैठ गई हैं। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर सिर नवा आर्य पद्धति से उन्हें नमस्कार किया, किन्तु इस पर भी जानकी का सन्देह दूर नहीं हुआ। वह गहरी निःश्वास छोड़ कर बोली, "हे मायावी! तुम या तो रावण के गुप्तचर हो या स्वयं रावण हो जो मुझे छलने के लिये आये हो। इस प्रकार के छल प्रपंच तुम्हें शोभा नहीं देते और न उस रावण के लिये ही ऐसा करना उचित है। और यदि तुम स्वयं रावण हो तो तुम्हारे जैसे विद्वान, शास्त्रज्ञ पण्डित के लिये तो यह कदापि शोभा नहीं देता। एक बार सन्यासी के भेष में मेरा अपहरण किया, अब एक वानर के भेष में मेरे मन का भेद जानने के लिये आये हो। धिक्कार है तुम पर और तुम्हारे पाण्डित्य पर!" यह कहते हुये सीता शोकमग्न होकर जोर-जोr से विलाप करने लगी।सीता को अपने ऊपर सन्देह करते देख हनुमान को बहुत दुःख हुआ। वे बोले, "देवि! आपको भ्रम हुआ है। मैं रावण या उसका गुप्तचर नहीं हूँ। मैं वास्तव में आपके प्राणेश्वर राघवेन्द्र का भेजा हुआ दूत हूँ। अपने मन से सब प्रकार के संशयों का निवारण करें और विश्वास करें कि मुझसे आपके विषय में सूचना पाकर श्री रामचन्द्र जी अवश्य दुरात्मा रावण का विनाश करके आपको इस कष्ट से मुक्ति दिलायेंगे। वह दिन दूर नहीं है जब रावण को अपने कुकर्मों का दण्ड मिलेगा और लक्ष्मण के तीक्ष्ण बाणों से लंकापुरी जल कर भस्मीभूत हो जायेगी। मैं वास्तव में श्री राम का दूत हूँ। वे वन-वन में आपके वियोग में दुःखी होकर आपको खोजते फिर रहे हैं। मैं फिर कहता हूँ कि भरत के भ्रा瓥40;ा श्री रामचन्द्र जी ने आपके पास अपना कुशल समाचार भेजा है और शत्रुघ्न के सहोदर भ्राता लक्ष्मण ने आपको अभिवादन कहलवाया है। हम सबके लिये यह बड़े आनन्द और सन्तोष की बात है कि राक्षसराज के फंदे में फँस कर भी आप जीवित हैं। अब वह दिन दूर नहीं है जब आप पराक्रमी राम और लक्ष्मण को सुग्रीव की असंख्य वानर सेना के साथ लंकापुरी में देखेंगीं। वानरों के स्वामी सुग्रीव रामचन्द्र जी के परम मित्र हैं। मैं उन्हीं सुग्रीव का मन्त्री हनुमान हूँ, न कि रावण या उसका गुप्तचर, जैसा कि आप मुझे समझ रही हैं। जब रावण आपका हरण करके ला रहा था, उस समय जो वस्त्राभूषण आपने हमें देख कर फेंके थे, वे मैंने ही सँभाल कर रखे थे और मैंने ही उन्हें राघव को दिये थे। उन्हें देख कर रामचन्द्र जी वेदना से व्याकुल होकर विलाप करने लगे थे। अब भी वे आपके बिन瓥6; वन में उदास और उन्मत्त होकर घूमते रहते हैं। मैं उनके दुःख का वर्णन नहीं कर सकता।" हनुमान के इस विस्तृत कथन को सुन कर जानकी का सन्देह कुछ दूर हुआ, परन्तु अब भी वह उन पर पूर्णतया विश्वास नहीं कर पा रही थीं। वे बोलीं, "हनुमान! तुम्हारी बात सुनकर एक मन कहता है कि तुम सच कह रहे हो, मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेना चाहिये। परन्तु मायावी रावण के छल-प्रपंच को देख कर मैं पूर्णतया आश्वस्त नहीं हो पा रही हूँ। क्या किसी प्रकार तुम मेरे इस सन्देह को दूर कर सकते हो?" सीता जी के तर्कपूर्ण वचनों को सुन कर हनुमान ने कहा, "हे महाभागे! इस मायावी कपटपूर्ण वातावरण में रहते हुये आपका hriday शंकालु हो गया है, इसके लिये मैं आपको दोष नहीं दे सकता; परन्तु आपको यह विश्वास दिलाने के लिये कि मैं वास्तव में श्री रामचन्द्र जी का दूत हूँ आपko एक अकाट्य प्रमाण देता हूँ। रघुनाथ जी भी यह समझते थे कि सम्भव है कि आप मुझ पर विश्वास न करें, उन्होंने अपनी यह मुद्रिका दी है। इसे आप अवश्य पहचान लेंगी।" यह कह कर हनुमान ने रामचन्द्र जी की वह मुद्रिका सीता को दे दी जिस पर राम का नाम अंकित था।

Dharmayan: Hanuman ke dwara Sita ki khoj

Dharmayan: Hanuman ke dwara Sita ki khoj


Wednesday, October 15, 2008

मलेशिया ने हिंदू संगठन पर प्रतिबंध लगाया

15 अक्टूबर 2008 मलेशिया
सरकार ने देश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ कथित भेदभाव को लेकर पिछले वर्ष विरोध का झंडा बुलंद करने वाले हिंदू संगठन हिंदू राइट ऐक्शन ग्रुप (हिंद्राफ) पर आज प्रतिबंध लगा दिया।
देश की करीब दो करोड 70 लाख की आबादी में सात प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं। चीनी मूल के मलेशियाई लोगों के साथ भारतीय मूल के लोगों ने भी मलेशिया सरकार की स्थानीय मुसलमानों को वरीयता देने वाली नीतियों के खिलाफ विरोध दर्ज किया था।विपक्षी डेमोक्रेटिक ऐक्शन पार्टी ने प्रतिबंध की यह कहकर निन्दा की कि हिंद्राफ पर प्रतिबंध लगाने के लिए गृह मंत्रालय की कड़े से कड़े शब्दों में आलोचना की जानी चाहिए। डीएपी के नेता लिम किट सियांग ने कहा “इससे भारतीय मूल के समुदाय में असंतोष और बढेगा।” मलेशिया ने हिंद्राफ के पांच कार्यकर्ताओं को पिछले वर्ष नवंबर से ही आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत हिरासत मे ले रखा है जिसमें बिना सुनवाई के आरोपी को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखने का प्रावधान है।

जरुरत है अंदर के रावन को जलाने की

हर साल की तरह इस साल भी दशहरे का अवसर धूमधाम से मनाने की तैयारियों में रावण को जलाना भी एक परंपरा का हिस्सा ही होगा।
जलता तो है रावण हर बरस ही.........लेकिनक्या कभी किसी ने इस प्रतीकात्मक स्वरूप पर गहराई से विचार करने का प्रयास किया भी है या नहीं?
आज तक रावण को बुराई का प्रतीक मानकर यही कहा जाता है कि इसे जलाने का मतलब है सारी बुराइयों को समूल नष्ट करना।
लेकिन फिर हर साल वही सब दोहराने यानी रावण को जलाने की आवश्यकता क्योंकर होतीहै, यह एक अहम् सवाल है।
यदि जलाना ही है तो व्यक्ति के अंदर पाए जाने वालेर् ईष्या, द्वेष, जलन, बदले की भावना, हिंसा आदि जितनी तमाम बुराइयाँ हैं, उन्हें जलाने का प्रयत्न किया जाए।
यदि ऐसा होगा तो फिर कोई राह नहींदिखाई देती है कि हर साल रावण को ही जलाकरर् कत्तव्य की इतिश्री मान ली जाए।
महती आवश्यकता तो इस बात की है कि प्रयास करें अंदर के रावण को जलाने का.....................

महात्मा गाँधी और हिंदुत्व

हम महात्मा गांधी को राष्ट्र पिता कहते हैं, किंतु उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भाषणबाजी और कुछ समारोहों के आयोजन के अलावा इस बात की जरा भी परवाह नहीं करते कि उन्होंने अपने अद्भुत नेतृत्व के दौरान क्या किया और क्या संदेश दिया? हिंदुत्व पर उनके गहन विचारों के बारे में तो हमारा बिल्कुल ही ध्यान नहीं है, जो न केवल व्यक्तिगत जीवन को उच्चतम आदर्शों से संबद्ध करते हैं, बल्कि राजनीति को श्रेष्ठ और सेवान्मुख भी बनाते हैं। डा. एस राधाकृष्णन और महात्मा गांधी के बीच धर्म पर रोचक बातचीत हुई थी। डा. राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी से तीन सवाल पूछे थे: आपका धर्म क्या है? आपके जीवन में धर्म का क्या प्रभाव है? सामाजिक जीवन में इसकी क्या भूमिका है?गांधीजी ने पहले सवाल का उत्तार दिया: मेरा धर्म है हिंदुत्व। यह मेरे लिए मानवता का धर्म है और मैं जिन भी धर्मों को जानता हूं उनमें यह सर्वोत्ताम है। दूसरे सवाल के उत्तार में गांधीजी ने कहा-आपके प्रश्न में भूतकाल के बजाय वर्तमान काल का प्रयोग खास मकसद से किया गया है। सत्य और अहिंसा के माध्यम से मैं अपने धर्म से जुड़ा हूं। मैं अक्सर अपने धर्म को सत्य का धर्म कहता हूं। यहां तक कि ईश्वर सत्य है, कहने के बजाय मैं कहता आया हूं-सत्य ही ईश्वर है। सत्य से इनकार हमने जाना ही नहीं है। नियमित प्रार्थना मुझे अज्ञात सत्य यानी ईश्वर के करीब ले जाती है। तीसरे सवाल पर महात्मा गांधी का जवाब था, ''इस धर्म का सामाजिक जीवन पर प्रभाव रोजाना के सामाजिक व्यवहार में परिलक्षित होता है या हो सकता है। ऐसे धर्म के प्रति सत्यनिष्ठ होने के लिए व्यक्ति को जीवनपर्यंत अपने अहं का त्याग करना होगा। जीवन के असीम सागर की पहचान में अपने एकात्म का समग्र विलोप किए बिना सत्य का अहसास संभव नहीं है। इसलिए मेरे लिए समाजसेवा से बचने का कोई रास्ता नहींहै। इसके परे या इसके बिना संसार में कोई खुशी नहीं है। जीवन का कोई भी क्षेत्र समाजसेवा से अछूता नहीं है। इसमें ऊंच-नीच जैसा कुछ नहीं है। दिखते अलग-अलग हैं किंतु हैं सब एक।''गांधीजी का कहना था कि जितनी गहराई से मैं हिंदुत्व का अध्ययन कर रहा हूं उतना ही मुझमें विश्वास गहरा हो जाता है कि हिंदुत्व ब्रहांड जितना ही व्यापक है। मेरे भीतर से कोई मुझे बताता है कि मैं एक हिंदू हूं और कुछ नहीं। सही अर्थों में महात्मा गांधी हिंदुत्व को मानवता के प्रति सेवा का ध्येय मानते हैं। उनके लिए जीव ही शिव है। मानव सेवा ही प्रभु सेवा है। यह भावना ही महात्मा गांधी को राजनीति की ओर खींच लाई। वह रेखांकित करते हैं कि मेरे भीतर के राजनेता ने एक भी निर्णय नहीं थोपा। अगर मैं आज राजनीति में भाग लेना चाहता हूं तो बस इसलिए कि राजनीति ने आज हमें किसी सांप की तरह पूरी तरह जकड़ लिया है। चाहे कोई कितना भी प्रयास करे, इसके चंगुल से नहीं बच सकता। मेरी इच्छा इस जकड़न से मुकाबला करने की है। महात्मा गांधी सोचते थे कि इससे मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाली शक्ति हिंदुत्व का सहारा लेकर राजनीति को नि:स्वार्थ सेवा के उच्च प्रतिमानों पर स्थापित किया जाए। सत्य, अहिंसा और शोषितों के कल्याण की भावना उन्होंने वेदों से ली। इस वेदांतिक भावना को अपने जीवन की कसौटी पर परखकर और अपने राजनीतिक फैसलों का आधार बना कर उन्होंने भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में संचारित किया। स्वतंत्रता संग्राम को जन आंदोलन में बदलने की गांधीजी को बड़ी सफलता सत्य, अहिंसा, त्याग, तपस्या के आदर्शों के प्रति उनके समर्पण के कारण मिली। भारतीयों के दिमाग में महात्मा गांधी की यह छवि युगों तक बसी रहेगी। अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने लिखा है- ''मैंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों से ही शक्तियां संचित की हैं।''गांधीजी ने राजनीति में शुचिता और धर्मपरायणता को मूर्त रूप दिया। उनका विश्वास था-सिद्धांतों से विमुख राजनीति मौत का फंदा है, यह राष्ट्र की आत्मा का नाश कर देती है। वे अपने विश्वास पर जीवनपर्यंत अडिग रहे और भारत का नैतिक कद इतना ऊंचा किया, जो विश्व इतिहास में अनूठा है। राजनीति के उद्देश्य के संदर्भ में भारत पूरी तरह महात्मा गांधी के विचारों की अवहेलना कर चुका है, जिसका परिणाम है कि आज तरह-तरह की समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। ये समस्याएं जातिवाद, क्षेत्रवाद के दायरे में निजी लाभ उठाने की प्रवृत्तिा, भयानक भ्रष्टाचार, लापरवाह उपभोक्ता वाद और गरीबों के प्रति बेरुखी के रूप में हमारे सामने हैं। अगर मौजूदा रुख में बदलाव नहीं आता तो इनकी संख्या में गुणात्मक वृद्धि होगी। देश पूरी तरह से सिद्धांतविहीन राजनीति और अव्यवस्था की सांप की बांबियों से घिर जाएगा। राजनीति के सांपों का सामना करने के बजाय हमारे राजनेता उनके साथ रहने की कला सीख गए हैं। इसी कारण आज हमारी संसद में सौ से अधिक ऐसे सदस्य हैं जिनका आपराधिक रिकार्ड है। इनमें से 34 तो हत्या, बलात्कार, अवैध वसूली जैसे संगीन मामलों में आरोपी हैं। इनमें से कुछ तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी स्थान पा चुके हैं। राज्य और नगरपालिका के स्तर पर तो हालात और भी खराब हैं। वे पूर्ण रूप से पैसा, ताकत, अपराध, भ्रष्टाचार और जातिवाद में डूबे हैं। फलस्वरूप हमारा शिक्षित और तुलनात्मक रूप से संपन्न वर्ग उदासीन हो गया है। हमारी गरीब जनता षड्यंत्रों का शिकार हो रही है। अधिकांश राजनेता यह मंत्र भूल गए हैं कि विरूपताओं पर आधारित जीत अस्थायी होती है, किंतु इसकी बर्बादी युगों-युगों तक कायम रहती हैं। भारत में अधिकांश लोग राजनीति को हिकारत की निगाह से देखते हैं। उनका मानना है कि राजनेता स्वार्थी और अनुचित साधनों से सत्ता हथियाने वाले होते हैं। राजनेता अपने गलत कामों को कुतर्कों के आधार पर सही ठहराते हैं। उनके लिए सत्ता ही सब कुछ है-सिद्धांत और नैतिकता कुछ नहीं। महात्मा गांधी भारत की राजनीति को बिल्कुल अलग दिशा में ले जाना चाहते थे, जिससे यह लोगों, समाज और राष्ट्र की बेहतरी में योगदान दे सके।

राम सेतु हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा नही

केंद्र सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में कहा है कि रामसेतु हिंदूधर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा या पूजा स्थल नहीं है जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 के तहत संरक्षण मिले।
केंद्र सरकार ने यह बात रामसेतु को तोड़ने का विरोध करने वाली याचिकाओं पर अपने लिखित जवाब में कही है। धार्मिक विश्वास व पूजा स्थल के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने दलील दी है कि याचिकाओं में दिए गए तर्कों से ये सिद्ध नहीं होता कि रामसेतु हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा और पूजा स्थल है।
संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में धार्मिक विश्वास व पूजा के तौर तरीकों को संरक्षण दिया गया है। इसके मुताबिक वह धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। सरकार ने कहा है कि जो धार्मिक विश्वास व पूजा के तौर तरीके धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं होते, उन्हें अनुच्छेद 25 व 26 के तहत संरक्षण नहीं प्राप्त है।
केंद्र सरकार ने धार्मिक विश्वास के संबंध में कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला दिया है। दलील में यह भी कहा गया है कि किसी समुदाय के विश्वास का मुद्दा भी कोर्ट में अन्य मामलों के तथ्यों की तरह ही सिद्ध किया जा सकता है और उसके बाद एक पंथनिरपेक्ष जज उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है। केंद्र सरकार ने कहा है कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाओं में यह कहीं नहीं कहा है कि रामसेतु धर्म के महत्वपूर्ण हिस्से की तरह पूजा स्थल है। या फिर हिंदू समुदाय ऐसा विश्वास करता है।
केंद्र सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए सेतुसमुद्रम परियोजना के मौजूदा स्वरूप के हक में और भी बहुत सी दलीलें दी हैं। एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता की याचिका का विरोध करते हुए सरकार ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया। सरकार ने कहा कि जयललिता ने वर्ष 2001 का चुनाव इसी परियोजना को पूरा करने का आश्वासन देकर जीता था और अब वे इसका विरोध कर रही हैं। सरकार ने एक तरह से फिर वही दलीलें दोहराई हैं जो उनके वकील कोर्ट में बहस के दौरान दे चुके हैं।
ज्ञात हो कि सुप्रीमकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल कर रामसेतु को तोड़े जाने का विरोध करते हुए सेतुसमुद्रम की वर्तमान परियोजना को चुनौती दी गई है। इन याचिकाओं पर बहस सुनने के बाद गत 30 जुलाई को सुप्रीमकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था हालांकि कोर्ट ने पक्षकारों को लिखित जवाब दाखिल करने की अनुमति दे दी थी।

Tuesday, October 14, 2008

भारतीय - संस्कृति

भरतीय संस्कृति विश्व की प्रधान संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं बल्कि ,वास्तविकता है । भारतीय संस्कृति को देव संस्कृति कहकर सम्मानित किया गया है । आज जब पूरी संस्कृति पर पाश्चात्य सभ्यता का तेजी से आक्रमण हो रहा है, यह और भी अनिवार्य हो जाता है कि, उसके हर पहलू को जो विज्ञान सम्मत भी है तथा हमारे दैनन्दिन जीवन पर प्रभाव डालने वाला भी, हम जन जन के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि हमारी धरोहर-आर्य संस्काति के आधार भूत तत्व नष्ट न होने पायें । भारतीय संस्कृति हमारी मानव जाति के विकास का उच्चतम स्तर कही जा सकती है । इसी की परिधि में सारे विश्वराष्ट के विकास के-वसुधैव कुटुम्बकम् के सारे सूत्र आ जाते हैं । हमारी संस्कृति में जन्म के पूर्व से मृत्यु के पश्चात् तक मानवी चेतना को संस्कारित करने का क्रम निर्धारित है । मनुष्य में पशुता के संस्कार उभरने न पायँ, यह इसका एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है । भारतीय संस्कृति मानव के विकास का आध्यात्मिक आधार बनाती है और मनुष्य में संत, सुधारक, शहीद की मनोभूमि विकसित कर उसे मनीषी, ऋषि, महामानव, देवदूत स्तर तक विकसित करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेती है । सदा से ही भारतीय संस्कृति महापुरुषों को जन्म देती आयी है व यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है ।

Monday, October 13, 2008

भारतीय धर्म और जातिगत भावना (Read it and know about hinduism )

आधुनिक काल में भारतीय गौरव का सिंहनाद करने, भारतीय आध्यात्मिकता को सुपरिभाषित करने और वैश्विक स्तर पर पुनर्प्रतिष्ठित करने वाले मनीषियों में स्वामी विवेकानन्द का नाम सर्वाधिक अग्रगण्य है, यह निर्विवाद है। उसी तरह यह भी निर्भ्रान्त है कि पददलित एवं आत्मविस्मृत हिन्दू जाति को सुसंगठित, शक्तिसम्पन्न और स्वाभिमान पूर्ण बनाने के लिए चिरजीवी संगठनतंत्र खड़ा करने वाले युगपुरुषों में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का नाम मूर्धन्य है। उनके विचारों से वैमत्य रखने वाले अनेक विचारक भी इस तथ्य पर एकमत देखे जा सकते हैं।
श्री गुरुजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करने से पूर्व यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए उल्लेखनीय है कि गुरुजी का आमूल व्यक्तित्व और समग्र कृतित्व स्वामी विवेकानन्द के मन और डा. हेडगेवार के प्राण-इन दो महत आधारों के संश्लेषण से ऊर्जस्वित् है, इन दो मूलाग्रों से संवर्धित-पुष्पित-पल्लवित है। सर्वविदित है कि गुरुजी के नाम से विख्यात माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जहां एक ओर डॉ. हेडगेवार से प्रेरणा ग्रहण कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक साधना का प्रबल आकर्षण उन्हें रामकृष्ण मठ के सारगाछी आश्रम ले गया। यहां उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द से मंत्रदीक्षा ग्रहण की। स्वामी अखंडानन्द ने ही अपने जीवन की सांध्यवेला में श्री गुरुजी को दैन्यग्रस्त समाज की सेवा में लगने का आदेश दिया। उन्होंने गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य कर स्वयं को पूर्णनिष्ठा के साथ शवप्रमीत पथ पर अर्पित कर दिया। विवेकानन्द के अमृतमंत्र का हेडगेवार के संगठनतंत्र मं संधारित हो जाने का नाम ही है माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य 'गुरुजी' हो जाना। वे समाज-साधना के धरातल पर उस प्रयागराज के समान हैं, जहाँ ज्ञानयोग और कर्मयोग की दो महती धाराएं एकाकार हो उठीं।
राष्ट्र-कार्य ईश्वरीय कार्यइसलिए यह अकारण नहीं है कि श्री गुरुजी ऐसे विलक्षण युगपुरुष हैं जिन्होंने राष्ट्रकार्य को ईश्वरीय कार्य की प्रामाणिक अधिमान्यता सिध्द की। हिन्दू समाज के मन में यह प्रतिष्ठापित किया कि राष्ट्र की सेवा शब्दश: ईश्वर की सेवा है। गहराई से देखें तो यह अद्भुत कार्य था। आजादी के आन्दोलन में हुतात्मा क्रान्तिकारियों ने अवश्य ही 'वन्दे मातरम्' से प्रेरणा ग्रहण कर आराध्य देव के रूप में भारत माता को प्रतिष्ठित करते हुए मातृचरणों में जीवन अर्पित कर दिया, किन्तु आमजन के मन में देशभक्ति अलग चीज, यही भाव बना रहा। गुरुजी ऐसे पहले मनीषी हैं जिन्होंने लाखों हिन्दुओं के मन में यह धारणा प्रतिष्ठित की धर्मग्रन्थ आदि का पारायण करें या राष्ट्र के लिए संगठन कार्य, दोनों तुल्यफल्य हैं। संघस्थल पर 'नमस्ते सदावत्सले....' के रूप में भारत माँ की प्रार्थना, संध्यावंदन से किसी भी रूप में न्यून नहीं है। राष्ट्रीय भावना की दृष्टि से यह ऐसी सिध्दि थी, जिसके आलोक में सुषुप्त हिन्दू समाज के उठ खड़ा होने का पथ-प्रशस्त होता है। निश्चय ही इसके मूल में स्वामी विवेकानन्द का यह कथन रहा होगा ''अगले पचास वर्ष तक मन से सभी देवी-देवताओं को हटा दो, अपने हृदय के सिंहासन पर भारत माता को आराध्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित करो। अब तो अपने स्वदेश बंधु ही अपने इष्ट देव हैं।''
भारत का स्वतन्त्रता आंदोलन मुख्य रूप से राजनीतिक आंदोलन था। भारत के पुनरोदय के स्वप्नदृष्टा अधिकतर राजनीति आवेष्टित थे। उनका विश्वास था कि राजनैतिक परिवर्तन सभी प्रकार के परिवर्तनों का मूल आधार है। हुआ यह कि, समाज और राष्ट्र को संचालित करने वाली वे सत्ताएं, जो राजनीति से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण थीं, गौण होकर राजनीति की महत्ता तले दब गईं। यह प्रक्रिया भारतीय परंपरा के विपरीत थी। फलत: राजनीति जिस महत्तर सत्ता के अधीन होनी चाहिए थी, वह उलटे राजनीति की जद में आ गई। स्वतंत्रता हांसिल तो हुई किन्तु, राष्ट्रबोध, जीवनदर्शन, समाजरचना आदि जावन के प्रमुख आयामों के विषय में आमजन विचारशून्य और विचारक किंकर्तव्यविमूढ़ ही बने रहे। पराधीनता का दैन्यभाव इस कदर ग्रस्त था कि अपनी महान् परंपरा की उपेक्षा कर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण हेतु जो कुछ वैदिशिक तत्व सुलभ हुआ, उसी का अंधानुकरण किया गया। मालिकों के महल से जो कुछ भी जुठन-चाटन, कचरा-पट्टी मिला, सब बटोर कर ले लिया गया। श्री गुरुजी की दूसरी अनुपम और महत्वपूर्ण देन इस अंधानुकरण के प्रखर प्रतिरोध की है। श्री गुरुजी स्वातंत्रोत्तर भारत के ऐसे प्रमुखतम व्यक्ति हैं जिन्होंने परकीयानुकरण के विरुध्द ''भारतीय परंपरा के समग्र'' का उद्धाटन कर, हिन्दूजीवन पध्दति की मौलिकता का दिग्दर्शन कराया। धर्म, अध्यात्म, देश, विदेश, समाजरचना, शिक्षा, अर्थनीति, संस्कृति आदि प्रत्येक जीवन से जुड़े आयामों पर भारतीय मन्तव्य उन्होंने प्रकाशित किया। गुरुजी द्वारा व्यक्तिवाद, समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद, मानववाद आदि तत्कालीन घटाटोप में भारतीय 'एकात्मदर्शन' का मिहिरोदय हुवा। सन् १९४७ में हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हांसिल की किन्तु सांस्कृतिक रूप से हम घोर परतंत्रता में जकड़े हुए थे। श्री गुरुजी की यह अविस्मरणीय महत्ता थी कि उन्होंने इस अधूरी स्वतंत्रता को समग्र स्वतन्त्रता में बदलने की अलख जगाई। कह सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता संग्राम के महानायक गांधीजी थे तो तद्नन्तर सांस्कृतिक स्वतंत्रता संग्राम के महानायक गुरुजी थे। राष्ट्र जीवन पर मानसिक गुलामी की काली छाया को राजनीति से परे रहकर दूर करने की साधना निश्चय ही स्वतंत्रता संग्राम का अग्रचरण था।
धर्म-चिन्तन''मनुष्य को मनुष्य बनाने का एक ही मार्ग है और वह है धर्म की शरण में जाना। 'धर्म' कहने का तात्पर्य वर्तमान में प्रयुक्त होने वाले 'धर्म' शब्द से नहीं है। वह तो सम्प्रदाय है। मेरा अभिप्राय सत्य सनातन धर्म से है।'' (श्री गुरुजी ओर्गनायजर, १४ नवम्बर १९५५) नीति कहती है कि आहार, निद्रादि कर्म तो मनुष्य के पशुओं के समान ही हैं किन्तु ''धर्मोहितेषामधिको विशेष:'' धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। अन्यथा तो धर्म से हीन मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं। ''तेनैव हीना पशुभि समाना:'' दुर्भाग्यवश यह शब्दों के अपप्रयोग की ही माया है कि पंथ, धर्म, सम्प्रदाय सब के तात्पर्य गड्डमड्ड होकर गड़बड़झाला स्थिति उत्पन्न हो गई। इसीलिए गुरुजी उक्त उध्दरण में स्पष्ट करते हैं कि धर्म शब्द से उनका क्या तात्पर्य है। वस्तुत: गुरुजी यहाँ जिस धर्म की बात कर रहे हैं वह किसी संप्रदाय, किसी पंथ अथवा किसी शास्त्रनिर्दिष्ट विधि-विधान या उपासना पध्दति नहीं वरन् तात्विक रूप से वह अवधारणा है, वह सद्गुणसमुच्चय है, जो मनुष्य का मानुषभाव पचाए रखती है। ईश्वरीय सत्ता से अधिष्ठित, वैश्विक नियमों पर अवलंबित यह अवधारणा मूलत: पंथनिरपेक्ष है और इसका एकमात्र मानदंड आमूल मानवीयमंगल है। अकारण नहीं है कि गुरुजी ने धर्म की चर्चा करते हुए जिस सूत्र की अपने भाषणों-लेखों में सर्वाधिक बार चर्चा की है, वह वैशेषिक दर्शन के प्रथम पाद का द्वितीय सूत्र ''यतोदभ्युदय नि:श्रेयस निध्दि:स धर्म:।'' यानें जिससे इहलौकिक समुत्कर्ष (अभ्युदय) और परलौकिक कल्याण (नि:श्रेयस्) की सिध्दि हो, वह धर्म है। गुरुजी इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं - ''धर्म की जो व्याख्याएं की गई हैं, कि जो समाज की धारणा करता हैं, समाज को सुव्यवस्था से रखता है, समाज के सभी प्रकार के लोगों को अपने-अपने कार्यों में लगाता हुआ समग्र समाज के अभ्युदय के लिए, रक्षा के लिए, श्रेष्ठ जीवन के लिए, सबके द्वारा परस्परपूरकता के कर्म करवाने की जिसके अंदर क्षमता हो वही धर्म है।'' स्पष्ट है कि श्री गुरुजी के मत में व्यक्ति के धार्मिक होने का पैमाना यह नहीं कि वह कितनी बार मंदिर जाता है अथवा उसके ललाट पर तिलक की रचना कैसी है। धार्मिक होने का मापदंड यह है कि सामाजिक घटक होने के नाते अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन की उसकी साधना कैसी है। मनु द्वारा कथित धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुध्दि, विद्या, सत्य और अक्रोध इन धर्म के दशलक्षणों का अभ्यास कैसा है। क्योंकि इन सद्गुणों के बिना व्यष्टितत्व, समष्टि तत्व में समरस हो जाए, यह कदापि संभव नहीं। व्यष्टि-समष्टि-परमेष्टि के सहज अन्तर्संबंध का ही नाम धर्म है। विश्व हिन्दू परिषद के एक सम्मेलन में गुरुजी ने सच्चा धर्म बताते हुए कहा है कि ''कई बार लोग धार्मिक बनने का अर्थ विचित्र-सा लगा लेते हैं। वे त्रिपुंड लगाते हैं, चन्दन लगाते हैं, घंटी बजा-बजाकर लंबी-चौड़ी पूजा करते हैं, परन्तु समाज का ध्यान नहीं लगाते। यह सब धर्म नहीं, यह तो धार्मिक बनने का आभास उत्पन्न करना मात्र हुआ। हमारा सच्चा धर्म तो यही है कि यह समाज अपना है, हम सब इसका चिंतन करें और हरेक आदमी स्वभूं पोषण कर सके - ऐसा स्वाभिमान उसमें निर्माण करें। जितने दीन-दुखी मिलें, वे सब भगवान के स्वरूप हैं और इस प्रकार भगवान ने अपनी सेवा का अवसर हमें प्रदान किया है। ऐसा समझें और इस भाव से उनकी प्रत्यक्ष सेवा करने के लिए उद्यत ।विहिप की स्थापनाधर्म के क्षेत्र में श्री गुरुजी की अद्वितीय देन है विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में प्रेरक की भूमिका निभाना। देशभर के साधु-संत-महन्त-महामंडलेश्वर-सन्यासियों को अपने-अपने पांथिक आग्रहों सें ऊपर उठाकर एकात्मधर्म की संकल्पना करना। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे धार्मिक बाह्यचारों में कुछ शताब्दियों से विकृतियों का जो कीचड़ जमा हो गया था, अस्पृश्यता जैसी समाजविघातक रूढ़ियां बध्दमूल हो गई थी, उनके अपमार्जन के लिए धर्माचार्यों को तैयार किये गये 'धर्मादेश' को सन् १९६४ में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद धर्मसंसद में प्रस्ताव के रूप में पारित किया गया। धर्म के मूल तत्व और उसके युगानुकूल भाष्य के प्रति प्रत्येक जिज्ञासु के लिए यह धर्मादेश न केवल पठनीय वरन् बारंबार मननीय भी है। श्री गुरुजी ने कहा है - ''हमारे पूर्वज एवं दृष्टाओं ने धर्म की व्याख्या के संदर्भ में कहा है कि जो सब लोगों को एक साथ जोड़कर सुसंस्कारित और सुसंगठित समाज के विकास हेतु निश्चित आचार-संहिता का निर्धारण करे, जिससे मानव मात्र का अभ्युदय हो, जो सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास एवं आदर्श समाज की कल्पना साकार करने में सहायक हो। समय-समय पर हमारे ऋषियों-मुनियों एवं त्रिकालदर्शी दृष्टाओं ने ऐसे सिध्दान्तों एवं नीति-नियमों का निर्माण किया, जो समयानुकूल सिध्द एवं सफल होकर एकात्मभाव विकसित कर सके।''
इस प्रकार धर्म का जो स्वरूप यहाँ प्रस्तुत हुआ है, उसमें धर्म संबन्धित सभी महत्वपूर्ण बिन्दु समाविष्ट हैं। (१) समाज में सुसंगत आचार-संहिता का निर्धारण करने वाला (२) लोक का अभ्युदय करने वाला (३) समाज का आध्यात्मिक विकास करने वाला। आदर्श समाज की कल्पना को साकार करने का यह एकमेव साधन है, किन्तु इसकी कसौटी क्या है? गुरुजी कहते हैं - (१) जो समयानुकूल हो और (२) जो एकात्मभाव विकसित कर सके।
आचारसंहिता जब-जब इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती तब-तब वे परिवर्तनाकांक्षी हो जाती हैं। वे तभी तक अपरिवर्तनीय हैं, जब तक एकात्मभाव अक्षुण्ण बना रहता है। 'धर्मादेश' में आगे जो कहा गया है, वह इस दृष्टि से निस्सन्देह प्रेरक है। ''भूतकाल में जो संहिताएं, मार्गदर्शन आवश्यक थे, किन्तु आज जो समाज हित में नहीं है उन्हें बदलना होगा। इन सब बातों का ध्यान रखकर, हम यह यंत्रणा देते हैं कि इस समाज का कोई भी वर्ग अस्पृश्य नहीं होगा, उसे कहीं भी, कभी भी, किसी भी सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने का पूर्ण अधिकार होगा। सामाजिक अस्पृश्यता, जो भूतकाल में प्रचलित थी समूल नष्ट की जाएगी तथा जो बंधु पीड़ित थे उन्हें समान श्रेणी, आदर एवं प्रेम से प्रतिष्ठा होगी।'' कुछ मतांध लोग संघ और गुरुजी पर मनुवादी, ब्राह्मणवादी होने का आरोप मंढते रहते हैं, कहना कठिन है कि इसमें कितनी धूर्तता शामिल है और कितना भोलापन, किन्तु यह समूचा संदर्भ उनकी मिची हुई ऑंखों को खोल देने के लिए पर्याप्त है, उनके कुतर्कों का सटीक उत्तर तो है ही।
हिन्दुत्व मीमांसाडॉ. हेडगेवार का बीजमंत्र था 'हिन्दू समाज और उसका संगठन।' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उन्होंने इसी ध्येयसिध्दि के लिए की। डॉ. साहब का सुविचारित मत था कि जब तक अपने देश का हिन्दू समाज संगठित और सशक्त नहीं होगा, देश का भला संभव नहीं। इस देश का विकास हुआ तो हिन्दुओं के द्वारा, विनाश हुआ तो हिन्दुओं के कारण। जब तक यह हिन्दू समाज अपने धर्मानुकूल आचार-विचार करता हुआ सुसंगठित रहा तो भारत ने विश्व का नेतृत्व किया, जगद्गुरु का सम्मान पाया। जब हिन्दू समाज धर्मच्युत होकर छिन्न-भिन्न हो गया तो देश परकीयों का गुलाम होता चला गया। डॉ. हेडगेवार की यह सौटंच खरी-दोटूक बात ही सारे ताने-बाने का केन्द्र बिन्दु है। उल्लेखनीय है कि यह वह समय था जब आम हिन्दू के लिए ऐसी बातें सोचना तो दूर 'हिन्दू' शब्द का उच्चारण भी लज्जास्पद माना जाता था। डॉ. हेडगेवार साहब से प्राप्त इस बीज मंत्र - 'हिन्दुत्व' के उज्ज्वल भाष्य का कार्य किया श्री गुरुजी ने। हिन्दुत्व की जो प्रखर और सर्वंकष मीमांसा श्री गुरुजी ने प्रस्तुत की उसने दैन्यग्रन्थ से ग्रस्त हिन्दू समाज को वैचारिक ऊष्मा प्रदान की। अनेकानेक संज्ञाशून्य पड़े विचारवान् लोग चैतन्य पाकर स्फूर्त हो उठे। हिन्दुत्व इस देश, इस मिट्टी की उपज है। भारतीयों की सहस्त्राब्दियों की चिंतन-मनन-अनुभव प्रणालियों का समेकित बोध है, संचित मधु है। हिन्दुत्व, भारतीयता का पर्याय है।
आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण काल में विदेशियों के सर्वंकष वर्चस्व से आहत भारत की मनीषा ने स्वयं को सुपरिभाषित करने के लिए अपनी सनातन परंपरा के पुनरोदय के रूप में हिन्दुत्व को अधिष्ठान बनाया। इस्लाम और ईसाइयत की उन निष्ठाओं के प्रतिकार स्वरूप-उन सभी निष्ठाओं के प्रतिकार स्वरूप जिनकी भावभूमि भारत की अपेक्षा कहीं अन्यत्र जुड़ती थी - यह आग्रह पुष्ट होता गया। किन्तु स्वतंत्रता आन्दोलन में हम देखते हैं कि मुस्लिम तुष्टिकरण के वशीभूत होकर हिन्दू शब्द से परहेज किया जाने लगा, भारत के चिरंतन मानबिन्दुओं को यों कहकर तिरस्कृत किया गया, कि ये हिन्दू साम्प्रदायिकता को पुष्ट करते हैं। यहां तक की 'वंदे मातरम्' को भी कटघरे में खड़ा कर दिया गया। कुलजमा बात यह कि 'हिन्दू' शब्द को सांप्रदायिक करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। यद्यपि वास्तविकता इससे भिन्न थी। बीसवीं सदी आरम्भ होने से पहले तक हिन्दू शब्द का प्रयोग ‘भारतीय’ के अर्थ में बेझिझक किया जाता था। सन् १८८४ में लाहौर में दिये गये सर सैयद अहमद के भाषण का जिक्र स्व. हो. वे. शेषाद्रि ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक ''और देश बंट गया'' में किया है, जिसका उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है और प्राय: लोगों के ध्यान में है। यहाँ एक ऐसा प्रमाण दिया जा रहा है, जो अब तक अनुद्धाटित ही रहा है। साम्यवाद के प्रवर्तक कार्लमार्क्स ने भी हिन्दू शब्द का प्रयोग भारतीय के अर्थ में किया है। यथा -
(१) 'दास केपीटल' के प्रथम खंड में, कंपनी व्यापारियों की लूट का वर्णन करते हुए मार्क्स लिखते हैं,''.... कर्मचारी स्वयं कीमत तय करते थे और दु:खी हिन्दुओं को लूटते थे।''
(२) डेनियलसन के नाम ९.२.१८८१ को लिखे पत्र में, अंग्रेजों द्वारा भारत में रेल व्यवस्था कायम करने पर मार्क्स ने यह टिप्पणी की, ''लाभांश अंग्रेजों को जरूर मिलता था, लेकिन जहां तक रेलों का संबन्ध है, हिन्दुओं के लिए वह बेकार थी'' (यूजलेस टू द हिन्दूज)।
(३) मार्क्स-एंगेल्स कृत, ''दॅ फर्स्ट इंडियन वार फॉर इंडिपेंडेंस'' में मार्क्स का मानना है कि ''भारत की स्वतंत्रता के दो तरीके हैं। एक, ब्रिटेन में क्रान्ति हो और सर्वहारा वर्ग सत्ता में आकर भारत को आजाद कर दें। दूसरा हिन्दू इतना शक्तिशाली हो जाये कि अंग्रेज जुआ पूरी तरह उतार फेंके।''
स्पष्ट है कि मार्क्स ने हिन्दू शब्द का प्रयोग समूचे भारतवासियों के लिए ही किया है, किसी सम्प्रदाय बोधक अर्थ में नहीं। वस्तुत: भारत को पुण्य भूमि मानने वाले वे सभी पंथ, संप्रदाय, मत 'हिन्दू' में समाविष्ट हैं जिनका मूलस्रोत भारत भूमि रही है। इतिहास साक्षी है कि यह हिन्दू सभी पंथों के प्रति समदृष्टि रखने वाला रहा है। सांप्रदायिकता इसकी मनोरचना से कभी मेल नहीं खाती। हिन्दू होने का अर्थ किसी संप्रदाय के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़े होने से सिध्द नहीं होता, वरन् इसका कुछ विशेष अर्थ है। ऐसा अर्थ, जो विश्वभर में किसी जाति के पास नहीं है।
सर्वश्रेष्ठ समाजसंघशिक्षा वर्ग - १९६९ के बौध्दिक में श्री गुरुजी कहते हैं - ''हम हिन्दू क्यों हैं? ईसाई नहीं हैं, मुसलमान नहीं है? इसलिए हिन्दू हैं क्या? ऐसा नकारात्मक विचार रहा तब संगठन की कोई आवश्यकता नहीं। इस हिन्दू शब्द का कोई ठोस अर्थ है क्या? इसका विचार करेंगे तभी संगठन करने की प्रेरणा मिलेगी। विचार करने पर ऐसा दिखाई देगा कि पृथ्वी के भिन्न-भिन्न देशों में रहने वाले कोई न कोई लक्ष्य लेकर उसकी पूर्ति के लिए भागदौड़ कर रहे हैं। सुख, धन-संपत्ति को जुटाना, उसकी रक्षा हेतु बलवान बनना, ऐसा अनुभव होने पर कि अपने देश की सीमाएं छोटी हैं, अन्य देशों पर आक्रमण कर विस्तार करना, चंद्रमा-मंगल पर जाकर वहाँ और यहां अपना प्रभुत्व स्थापित कना - साधारणत: यही लक्ष्य दिखाई देता है।... '' ’आत्मनो मोक्षार्थम् जगद् हिताय च’ इस जीवन लक्ष्य को चरितार्थ करने वाला, निष्काम भाव से ऐसे जीवन की परम्परा चलाने वाला सर्वश्रेष्ठ समाज - याने हिन्दू समाज - ऐसा अर्थ अपने ध्यान में आना चाहिए और अपने उदाहरण के द्वारा दूसरे के ध्यान में भी लाना है। इस निमित्त ही हम हिन्दू समाज का संगठन कर रहे हैं।'' (श्री गुरुजी समग्र: खंड - ४ पृष्ठ २६१)
श्री गुरुजी ने हिन्दुत्व को व्यापक अभिप्राय से जोड़ते हुए इसे इसके राजनीतिक अभिप्राय से भिन्न, एक राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अभिप्राय से अभिषिक्त किया। हिन्दुत्व का यह सांस्कृतिक अभिप्राय ही भावात्मक ऐक्य और राष्ट्र के विकास में सक्षम है। क्योंकि यह हिन्दुत्व नकारात्मक नहीं, सकारात्मक है। द्वन्द्वात्मक नहीं, निर्द्वन्द्वात्मक है। गौरतलब है कि हिन्दुत्व का यह अभिप्राय 'हिन्दुत्व' शब्द मात्र से वृश्चिकदंश की सी पीड़ा महसूस करने वाले कुबुध्दिवादियों को तो त्याज्य है ही, कट्टर हिन्दूवाद का दंभ पालने वाले प्रतिक्रियावादियों को भी विचलित कर देता है। कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करते हुए श्री गुरुजी कहते हैं - ''जो अपने आप को कट्टर हिन्दू कहते हैं, उनकी भावना का भी यदि हम विश्लेषण करें तो बड़ी विचित्र स्थिति दिखाई पड़ती है। हिन्दू हमारा उपनाम मात्र बन गया है। हिन्दू याने पालिटिकल हिन्दू, मुसलमानों के खिलाफ बोलने वाला हिन्दू, ईसाईयों के विरोध में प्रचार करने वाला हिन्दू। हिन्दू का यह नकारात्मक रूप ठीक नहीं है। हिन्दुत्व की अनुभूति हमें अपनी आत्मा में होनी चाहिए। प्रतिक्रियात्मक हिन्दुत्व किसी भी काम का नहीं... मै हिन्दू हूँ, इसका अर्थ है - मेरे अंदर कुछ असामान्य गुण हैं, मेरी कुछ अलग परंपरा है, मेरे जीवन का ध्येय हिन्दुत्व के अनुरूप है। इस प्रकार हमारी धारणा भावात्मक, रचनात्मक एवं क्रियात्मक रहनी चाहिए, प्रतिक्रियात्मक कदापि नहीं।''

स्वर्ण मंदिर में शूटिंग नही करने का निर्णय

फ़िल्म निर्माताओं के लिए अब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में शूटिंग करना आसान नहीं होगा। ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ का कहना है कि मंदिर में आए दिन होने वाली शूटिंग से श्रद्वालुओं को मुश्किलों का सामना करता पड़ता है।लिहाजा, शूटिंग की इजाजत देने के लिए अब एक अलग-समिति का गठन किया जाएगा, जो पूरी फिल्म की कहानी सुनने के बाद ही शूटिंग की इजाजत देगी। इस बात की जानकारी देते हुए ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ के अध्यक्ष अवतार सिंह मक्कड़ ने कहा कि, “ये फैसला सिख संगत की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर किया गया है।”दरअसल, फिल्मों के हैरान-परेशान किरदार अक्सर स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकते नजर आते हैं। ऐसी फिल्मों की शूटिंग यहां बड़े कैमरों से की जाती है, जिससे यहां आने वाले श्रद्वालुओं को कीर्तन सुनने में काफी परेशानी होती थी।इसके साथ ही, ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ ने स्वर्ण मंदिर के आस-पास बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताई है। अब समिति मंदिर के आस-पास सटे पटाखे बनाने वाले कारखानों पर भी नकेल कसने की सोच रही है।

ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या/Brahm Satyam Jagat Mithya

परब्रह्म परमात्मा को न जानना उसका नाम है अविद्या। उसे कारण शरीर भी कहते हैं। कारण शरीर से सूक्ष्म शरीर बनता है। सूक्ष्म शरीर की माँग होती है देखने की, सूघँने की, चखने की। सूक्ष्म शरीर की इच्छा होती है तो फिर स्थूल शरीर धारण होता है। स्थूल शरीर के द्वारा जीव भोग की इच्छाओं को पूर्ण करना चाहता है। स्थूल शरीर से भोग भोगते-भोगते सूक्ष्म शरीर को लगता है कि इसी में सुख है और अपना जो सुखस्वरूप है उसे भूल जाता है। अविद्या के कारण ही व्यक्ति अपने असली स्वरूप को जान नहीं पाता है।
यह बहुत सूक्ष्म बात है। यह ब्रह्म विद्या है। इसको सुनने मात्र से जो पुण्य होता है, उसको बयान करने के लिए घंटो का समय चाहिए। इसे सुनकर थोड़ा बहुत मनन करे उसका तो कल्याण होता ही है लेकिन मनन के पश्चात् निदिध्यासन करके फिर उस परमात्मा में डूब जाए, परमात्मामय हो जाए तो उसके दर्शन मात्र से औरों का भी कल्याण हो जाता है। नानक जी कहते हैः
ब्रह्मज्ञानी का दर्शन बड़भागी पावै।
भाग्यवान व्यक्ति ही ब्रह्मज्ञानी महापुरूष के दर्शन कर सकता है। अभागे को ब्रह्मज्ञानी के दर्शन भी नहीं होते हैं। थोड़े भाग्य होते हैं तो धन मिल जाता है। थोड़े ज़्यादा भाग्यवान को पद-प्रतिष्ठा मिलती है लेकिन महाभाग्यवान को संत मिलते हैं। संत का मतलब है जिनके जन्म मरण का अन्त हो गया है, जिनकी अविद्या का अंत हो गया है। ऐसे संतो के लिए तुलसीदास जी ने कहा हैः
पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
जब व्यक्ति के पुण्यों का पुंज, पुण्यों का खज़ाना भर जाता है तब उसे संत मिलते हैं और जब संत मिलते हैं तो भगवान मिलते हैं। भगवान की कृपा से, पुण्यों के प्रभाव के कारण संत मिलते हैं। जब दोनों की कृपा होती है तब आत्म-साक्षात्कार होता है।
ईश कृपा बिन गुरू नहीं, गुरू बिना नहीं ज्ञान।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहीं वेद पुराण।।
ईश्वर की कृपा के बिना गुरू नहीं मिलते और गुरू की कृपा के बिना ज्ञान नहीं मिलता।
गुरू का मतलब यह नहीं कि थोड़ा त्राटक आदि कर लिया, थोड़ी-बहुत बोलने की कला सीख ली, थोड़े-बहुत भजन-कीर्तन, किस्से-कहानियाँ, कथा-प्रसंगों से लोगों को प्रभावित कर दिया और बन गए गुरू।
गोपो वीज्जी टोपो घिसकी वेठो गादीय ते।
गोपा टोपा पहनकर गादी पर बैठ गया और गुरू बन कर कान में फूँक मार दिया, मंत्र दे दिया, माला पकड़ा दी। आजकल ऐसे गुरूओं का बाहुल्य है।
विवेकानन्द कहते थेः ‘’गुरू बनना माने शिष्यों के कर्मों को सिर पर ले लेना, शिष्यों की जिम्मेदारी लेना। यह कोई बच्चों का खेल नहीं है। आजकल जो गुरू बनने के चक्कर में पड़ गए हैं वे लोग ऐसे हैं जैसे कंगला आदमी प्रत्येक व्यक्ति को हज़ार सुवर्णमुद्रा दान करने का दावा करता है। ऐसे लेभागु गुरूओं के लिए कबीर जी ने कहा हैः
गुरू लोभी शिष्य लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों डूबे बावँरे चढ़ी पत्थर की नाव।।
एक राजा था। उसका कुछ विवेक जगा था तो वह अपने कल्याण के लिए कथा-वार्ताएँ सुनता रहता था पर उसके गुरू ऐसे ही थे। राजा को उनकी कथाओं से कोई तसल्ली नहीं मिली, चित्त को शांति नहीं मिली।
आखिर वह राजा कबीर जी के पास आया। उसने कहाः ‘’महाराज, मैंने बहुत कथाएँ सुनी हैं लेकिन आज तक मेरे चित्त को चैन नहीं मिला।‘’
कबीर जी ने कहाः ‘’अच्छा, मैं कल राजदरबार में जाऊँगा। तुम अठारह साल से कथा सुनते हो और शांति नहीं मिली ? कौन तुम्है कथा सुनाते है वह मैं देखूँगा।‘’ दूसरे दिन कबीर जी राजदरबार में गए। उन्होंने राजा से कहाः ‘’जिनसे ज्ञान लेना होता है, जिनसे शांति की अपेक्षा रखते हो उनके कहने में चलना पड़ता है।‘’ राजा ने कहाः ‘’महाराज, मैं आपके चरणों का दास हूँ। आपके कहने में चलूँगा। आप मुझे शांतिदान दें।‘’
कबीर जी ने कहाः ‘’मेरे कहने में चलते हो तो वजीरों से कह दो कि कबीर जी जैसा कहें वैसा ही करना।‘’ राजा ने वजीरों से कहाः ‘’अब मैं राजा नहीं हूँ, ये कबीर जी महाराज ही राजा हैं। उन्हें सिंहासन पर बिठा दो।‘’ कबीर जी राजा के सिंहासन पर विराजमान हो गए। फिर कबीर जी ने कहाः अच्छा, ‘’वजीरों को मैं हुक्म देता हूँ कि जो पंडित जी तुम्हें कथा सुनाते हैं, उनको एक खम्भे के साथ बाँध दो।‘’
राजा ने कहाः भाई, उनको महाराज जी के आगे खम्भे के साथ बाँध दो।‘’ पंडित जी को एक खम्भे के साथ बाँध दिया गया। फिर कबीर जी ने कहाः ‘’राजा को भी दूसरे खम्भे से बाँध दो।‘’ वजीर थोड़ा हिचकिचाए किन्तु राजा का संकेत पाकर उन्हें भी बाँध दिया। इस तरह पंडित जी और राजा दोनों बँध गए। अब कबीर जी ने पंडित से कहाः ‘’पंडित जी, राजा कई वर्षों से तुम्हारी सेवा करता है, तुम्हें प्रणाम करता है, तुम्हारा शिष्य है, वह बँधा हुआ है उसे छुड़ाओ।‘’
पंडित ने कहाः ‘’मैं राजा को कैसे छुड़ाऊँ ? मैं खुद बँधा हुआ हूँ।‘’ तब कबीर जी ने कहाः
बन्धे को बन्धा मिले छूटे कौन उपाय।
सेवा कर निर्बन्ध की जो पल में देत छुड़ाए।।
जो खुद स्थूल शरीर में बँधा हुआ है, सूक्ष्म शरीर में बँधा है, विचारों में बँधा है, कल्पनाओं में बँधा है ऐसे कथाकारों को, पंडितों को हज़ारों वर्ष सुनते रहो फिर भी कुछ काम नहीं होगा। उससे चित्त को शांति, चैन, आनन्द, आत्मिक सुख नहीं मिलेगा।
सेवा कर निर्बन्ध की जो पल में देत छुड़ाए।
निर्बन्ध की सेवा से, निर्बन्ध की कृपा से अज्ञान मिटता है और आत्मज्ञान का प्रकाश मिलता है। सच्ची शांति और आत्मिक सुख का अनुभव होता है।
मनुष्य अविद्या के कारण किसी कल्पना में, किसी मान्यता में, किसी धारणा में बँधा हुआ होता है। पहले वह तमस में, आसुरी भाव में बँध जाता है। धन तो बैंक में होता है और मनुष्य मानता है ‘’मैं धनवान।‘’ पुत्र तो कहीं घूम रहे हैं और मानता है ‘’मैं पुत्रवान।‘’ फिर ‘’मैं त्यागी...मैं तपस्वी...मैं भोगी...मैं रोगी...मैं सिंधी...मैं गुजराती...’’ इसमें मनुष्य बँध जाता है। उससे थोड़ा आगे निकलता है तो ‘मैं कुछ नहीं मानता...जात-पांत में नहीं मानता...मैं किसी पंथ में नहीं मानता।‘ इस तरह ‘न माननेवाले ‘ में बँध जाता है।
ऐसा जीव न जाने किस गली से निकलकर किस गली में फँस जाता है। किस भाव से छूटकर किस भाव में बँध जाता है। लेकिन जब जीव को निर्बंध पुरूष, सदगुरू मिल जाते हैं तो वह उनकी कृपा से सब बँधनों से मुक्त हो जाता है, उसकी अविद्या दूर हो जाती है और वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह ब्रह्मवेत्ता हो जाता है।

Sunday, October 12, 2008

Significance of Ramcharitmanas

Significance of Ramcharitmanas

(चौपाई)
एहि महँ रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥मंगल भवन अमंगल हारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥ १ ॥
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ । राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥बिधुबदनी सब भाँति सँवारी । सोन न बसन बिना बर नारी ॥ २ ॥
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी । राम नाम जस अंकित जानी ॥सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥ ३ ॥
जदपि कबित रस एकउ नाही । राम प्रताप प्रकट एहि माहीं ॥सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा ॥ ४ ॥
धूमउ तजइ सहज करुआई । अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी । राम कथा जग मंगल करनी ॥ ५ ॥(छंद)
मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की ॥गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ॥प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ॥भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥(दोहा)
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग ।दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥ १०(क) ॥स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥ १०(ख) ॥

Ramayan

On the banks of the Sarayu river stood the magnificent city of Ayodhya, the capital of the kingdom of Kosala. King Dasaratha, its ruler performed ceremonial sacrifice to fire God for having desirable son (putreshthi yagna). As a result, Ram was born to Kaushalya, Laxman and Shatrughna to Sumitra and Bharat to Kaikeyi. As they grew, sacred thread ceremony was held for all the four brothers.
One day Sage Vishwamitra, approached the king, asking for Ram and Laxman's help in killing demons who were disturbing his meditation. Dasharatha was apparently hesitant as Ram and Laxman were of tender age at that time and were not ready for a fight against mighty demons. However Dashratha consented as sage Vashishta advised him that it would be in their best interest. They would learn numerous secret art and weaponry from Vishwamitra.
Vishwamitra led Ram and Laxman to his hermitage (ashram). On their way, Tadaka (or Tataka) obstructed. On Vishwamitra's command, Ram at once killed Tadaka. On reaching his ashram, Vishwamitra started oblation and assigned the task of protecting the place to Ram and Laxman. The heroic lads destroyed and thrashed demons like Marich, Khar-Dushan and Subahu easily. Vishwamitra was impressed and took them under his wing and trained them to use magic weaponry.
King Janaka invited Vishwamitra to adorn the swayamvar of his daughter, Sita. Vishwamitra asked Ram and Laxman to accompany him to the kingdom of Mithila ruled by King Janaka. On their way to Janakpur, Ram noticed a stone idol of a beautiful woman lying on ground. Vishwamitra told Ram the history behind it. She was Ahilya, wife of Sage Gautama but turned into stone due a curse given by Gautama for her misconduct. Sri Ram touched the stone with her feet and she transformed back to her original form.
At Janakpuri, Vishwamitra took Ram and Laxman for sight seeing. At flower garden, Ram had first glimpse of Sita and both were mutually attracted. The day of swayamvar arrived. Janaka proclaimed that the man who could string the mighty bow of Shiva would win his beautiful daughter, Sita's hand in marriage. Many kings tried to lift the great bow, but none could even budge it. Janak was disheartened. He lamented that 'it seems that the earth is devoid of brave men. My daughter would remain unmarried.'
Rama, with the blessings of the gods and his guru Vishwamitra, lifted the bow with no effort. As he bent down to string the bow, it broke with a sound that echoed in the three worlds, leaving him shocked at his own strength. Sita was overjoyed and garlanded Ram. But the path was not all rosy for Ram. As news of breaking of arrow spread like wildfire, Parshuram known for his anger came to the site. When he saw broken bow he asked who did it. Ram promptly made him calm with his courteous replies. When Parshuram figured out the true identity of Ram, he was very much pleased and blessed him.
Envoy was sent to Ayodhya with this good news. Dashratha prepared for a grand procession and arrived in Mithila. A grand ceremony marked the marriage of Ram and Sita. With the advise of Vashishta, Laxman, Bharat and Shatrughna were married to Janak's other daughters namely Urmila, Mandavi and Shrutkirti in order.
After few days, Dashratha departed for Ayodhya along with four newly wedded couples. For the people of Ayodhya, it turned out to be a festival of festivals.

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