Tuesday, September 30, 2008

हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा

हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा
मानव का विश्वास जगेगा
भेद भावना तमस ह्टेगा
समरसता अमृत बरसेगा
हिन्दु जगेगा विश्व जगेगा
हिन्दु सदा से विश्व बन्धु है
जड चेतन अपना माना है
मानव पशु तरु गीरी
सरीता में एक ब्रम्ह को पहचाना
है जो चाहे जिस पथ से आये
साधक केन्द्र बिंदु पहुचेगा ॥१॥
इसी सत्य को विविध पक्ष से वेदों में हमने गाया था
निकट बिठा कर इसी तत्व को उपनिषदो में समझाया था
मन्दिर मठ गुरुद्वारे जाकर यही ज्ञान सत्संग मिलेगा ॥२॥
हिन्दु धर्म वह सिंधु अटल है जिसमें सब धारा मिलती है
धर्म अर्थ ओर काम मोक्ष की किरणे लहर लहर खिलती है
इसी पुर्ण में पुर्ण जगत का जीवन मधु संपुर्ण फलेगा
इस पावन हिन्दुत्व सुधा की रक्षा प्राणों से करनी है
को आर्यशील की शिक्षा निज जीवन से सिखलानी है
द्वेष त्वेष भय सभी हटाने पान्चजन्य फिर से गूंजेगा ॥३॥
"दूसरों से सहायता की आशा करना या भीख मांगना किसी दर्बलता का चिन्ह है।इसलिये बंधूओं निर्भयाता के साथ यह घोषणा करो की हिंदूस्तान हिंदूओं का ही है।
अपने मन की दूर्बलता को बिल्कुल दूर भगा दो।"- डा। हेडगेवार"
केवल तब और तब ही तुम हिन्दू कहलाने के लायक हो,जब उस शब्द को सुनते हीतुम्हारी रगों में से शक्ती की विद्युत तरंग दौड जाए"--स्वामी विवेकानंद

Monday, September 29, 2008

अथ श्री देव्या: कवचम

अथ देव्या: कवचम
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्त मातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्‍‌वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोग:।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छ्रणुष्व महामुने॥2॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥
नवं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।विषमे दुर्गमे चैव भयार्ता: शरणं गता:॥6॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।नापदं तस्य पश्यामि शोकदु:खभयं न हि॥7॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि: प्रजायते।ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशय:॥8॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
इत्येता मातर: सर्वा: सर्वयोगसमन्विता:।नानाभरणशोभाढया नानारत्‍‌नोपशोभिता:॥12॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्य: क्रोधसमाकुला:।शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।कुन्तायुधं त्रिशूलं च शा‌र्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥15॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥19॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।जया मे चाग्रत: पातु विजया पातु पृष्ठत:॥ 20॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मू‌र्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥23॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
नीलग्रीवा बहि:कण्ठे नलिकां नलकूबरी।स्कन्धयो: खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मन: शोकविनाशिनी।हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।पूतना कामिका मेढं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
कटयां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवो‌र्ध्वकेशिनी।रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
रक्त मज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्‍‌वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
आयू रक्षतु वाराही धर्म रक्षतु वैष्णवी।यश: कीर्ति च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्या रक्षतु भैरवी॥40॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा।राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिता॥41॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।तत्सर्व रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मन:।कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजय: सार्वकामिक:।यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्रापनेति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥
निर्भयो जायते म‌र्त्य: संग्रामेष्वपराजित:।त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य: कवचेनावृत: पुमान्॥45॥
इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभम्।य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्धयं श्रद्धयान्वित:॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित:।जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित:॥47॥
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय:।स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥48॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।भूचरा: खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिका:॥49॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शकिनी तथा।अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला:॥50॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:।ब्रह्मराक्षसवेताला: कूष्माण्डा भैरवादय:॥51॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥52॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्रपौत्रिकी॥54॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादत:॥55॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥
अर्थ :- ॐ श्री जगदम्बार्पणमस्तु !

युग yug

द्वापर मानवकाल के तृतीय युग को कहते हैं।
ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:
चारों युग
4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष ) कलि युग
3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष)त्रेता युग
2 चरण (864,000 सौर वर्ष)द्वापर युग
1 चरण (432,000 सौर वर्ष)कलि युग

Friday, September 26, 2008

मूर्ति पूजा

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों द्वारा पूजा करते हैं । उनके लिये मूर्ति एक असान सा साधन है, जिसमें कि एक ही निराकार ईश्वर को किसी भी मनचाहे सुन्दर रूप में देखा जा सकता है । हिन्दू लोग वास्तव में पत्थर और लोहे की पूजा नहीं करते, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं । मूर्तियाँ हिन्दुओं के लिये इश्वर की भक्ति करने के लिये एक साधन मात्र हैं । जब ब्रह्म कर्ता का भाव ग्रहण करता है जैसे सृष्‍टि‍कर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता आदि‍ या जब ब्रह्म के साथ कोई वि‍शेषण लगता है जैसे सर्वव्‍यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्‍ति‍मान् आदि‍ तब वह सगुण ब्रह्म या ईश्‍वर कहलाता है. सगुण ब्रह्म या ईश्‍वर की ही उपासना की जा सकती है.हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य के इति‍हास में भक्‍ति‍ काल को निर्गुण भक्‍ति‍ शाखा तथा सगुण भक्‍ति‍ शाखा में वि‍भाजि‍त कि‍या गया है. कबीर जैसे कवि‍ जो नि‍राकार ईश्‍वर में वि‍श्‍वास करते थे और निर्गुण ब्रह्म के उपशक माने जाते थे ।भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद का महत्वपूर्ण स्थान है । सबके लिए सरल सीधी पूजा-पद्धति को आविष्कार करने का श्रेय भारत को ही प्राप्त है । पूजा-पद्धति की उपयोगिता और सरलता की दृष्टि से हिन्दू धर्म की तुलना अन्य सम्प्रदायों से नहीं हो सकती । हिन्दू धर्म में ऐसे वैज्ञानिक मूलभूत सिद्धांत दिखाई पउ़ते हैं, जिनसे हिन्दुओं का कुशाग्र बुद्धि विवेक और मनोविज्ञान की अपूर्व जानकारी का पता चलता है । मूर्ति-पूजा ऐसी ही प्रतीक पद्धति है । मूर्ति-पूजा क्या है? पत्थर, मिट्टी, धातु या चित्र इत्यादि की प्रतिमा को माध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं । निराकार ब्रह्म का मानस चित्र निर्माण करना कष्टसाध्य है । बड़े योगी, विचारक, तत्ववेत्ता सम्भव है यह कठिन कार्य कर दिखायें,किन्तु साधारण जन के जिए तो वह नितांत असम्भव सा है । भावुक भक्तों, विशेषतः नारी उपासको के लिए किसी प्रकार की मूर्ति का आधार रहने से उपासना में बड़ी सहायता मिलती है । मानस चिन्तन और एकताग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है । साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना अन्तःचेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है । मनीषियों का यह कथन सत्य हे कि इस प्रकार की मूर्ति-पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उदे्रक और संचार विशेष रूप से हमारे अन्तःकरण में करती है । यों कोई चाहे, तो चाहे जब जहाँ भगवान को स्मरण कर सकता है, पर मन्दिर में जाकर प्रभु-प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनंद प्राप्त होता है, वह बिना मन्दिर में जाये, चाहे, जब कठिनता से ही प्राप्त होगा । गंगा-तट पर बैठकर ईश्वरीय शक्तियों का जो चमत्कार मन में उत्पन्न होता है, वह अन्यत्र मुश्किल से ही हो सकता है ।

Thursday, September 25, 2008

चाणक्य (chanakya)

चाणक्य कौटिल्य नाम से भी विख्यात हैं जो महान् सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। उन्होने नदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया था
कौटिल्य, ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेदों का गहन अध्ययन किया. क्या यह गौरव का विषय नहीं कि दुनियाँ के सबसे पुराने विश्वविद्यालय, तक्षशिला और नालन्दा भारतीय उपमहाद्वीप में थे. और हाँ, ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम ५०० से ४०० वर्ष ईसा पूर्व की बात कर रहे हैं. तक्षशिला एक सुस्थापित शिक्षण संस्थान था और माना जाता है कि पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण की रचना यहीं की थी. चाणक्य भी बाद में यहाँ नीतिशास्त्र के व्याख्याता हुए (कुशाग्र छात्र, है न!). ऐसा कहा जाता है कि वे व्यवहारिक उदाहरणों से पढ़ाते थे. यूनानी लोगों के तक्षशिला पर चढ़ाई करने कारण से वहाँ एक राजनैतिक उथल-पुथल मच गयी और चाणक्य को मगध में आकर बसना पड़ा. उन्हें नि:संदेह एक राजा के निर्माता के रूप में अधिक जाना जाता है. चंद्रगुप्त मौर्य विशेष रूप से उनकी सलाह मानते थे. शत्रुओं की कमज़ोरी को पहचाकर उसे अपने काम में लाने की विशिष्ट प्रतिभा के चलते चाणक्य हमेशा अपने शत्रुओं पर हावी रहे. उन्होंने तीन पुस्तकों की रचना की- ‘अर्थशास्त्र‘, ‘नीतिशास्त्र’ तथा ‘चाणक्य नीति’. ‘नीतिशास्त्र’ में भारतीय जीवन के तौर-तरीकों का विवरण है तो ‘चाणक्य नीति’ में उन विचारों का लेखा-जोखा है जिनमें चाणक्य विश्वास करते थे और जिनका वे पालन करते थे.
राष्ट्रीय नीतियों, रणनीतियों तथा विदेशी संबंधो पर लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ उनकी सर्वाधिक विख्यात पुस्तक है. प्रबंधन की दृष्टि से एक राजा तथा प्रशासन की भूमिका तथा कर्तव्यों को यह पुस्तक स्पष्ट करती है. यह पुस्तक एक राज्य के सफल संचालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है. उदाहरण के लिये यह न सिर्फ़ आपदाओं तथा अनाचारों से निपटने की राह बताती है बल्कि अनुशासन तथा नीति-निर्धारण के तरीकों का भी उल्लेख करती है. इसी विषय पर लिखी एक और पुस्तक है ‘द प्रिंस‘ जो कि मैकियावेली द्वारा रचित है, हालांकि विषय समान होते हुए भी यह पुस्तक चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ से सर्वथा भिन्न है. मैकियावेली पन्द्रहवीं शताब्दी के इतालवी राजनैतिक दार्शनिक थे. अपनी सत्ता को का़यम रखने के लिये एक महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी को क्या नीतियाँ अपनानी चाहिये, उनकी किताब इसी विषय पर केंद्रित है.

Wednesday, September 24, 2008

धर्म परिवर्तन

पौराणिक काल में लगभग आज से तीन हजार वर्ष पूर्व जब जैन और बौद्धों को देखकर आर्य जाति में मूर्तिपूजा प्रचलित हुई, तब उस समय के पौराणिक ब्राह्मणों को भय हुआ कि कहीं उनके यजमान सब जैन वा बौद्ध न बन जायें तो ब्राह्मण उनको भयभीत करने के लिये निम्न प्रकार के श्‍लोकों की रचना करने लगे -
न वदेद्यावनीं भाषां प्राणै कण्ठगतैरपि ।

हस्तिना ताड्यमानोऽपि न गच्छेज्जैनमन्दिरम् ॥



चाहे कितना भी दुःख प्राप्‍त हो और मृत्यु का समय भी क्यों न आ जावे तो भी यावनी अर्थात् म्लेच्छ भाषा मुख से न बोलनी चाहिए और उन्मत्त हाथी मारने को क्यों न दौड़ा आता हो, तो भी जैन मन्दिर में प्रवेश कर बचने की अपेक्षा हाथी के सामने जाकर मर जाना अच्छा है ।



इस प्रकार के श्‍लोकों की रचना का उद्देश्य केवल एकमात्र यही था कि उस समय आर्य लोग जैन, बौद्ध बनने से बच जावें । जब इतने मात्र से भी कार्य च्लता दिखाई न दिया तो पौराणिक ब्राह्मणों ने १८ (अठारह) पुराणों की रचना की और जैन तीर्थङ्करों के समान विष्णु के अवतार की रचना कर डाली । शिव, राम, कृष्ण आदि राजाओं को देवता व अवतार मानकर उनकी मूर्त्तियां बनाईं और मूर्त्तियां मन्दिरों में स्थापित करके उनकी पूजा करवाने लगे । इसी प्रकार कहीं शिव की मूर्त्ति, उनकी रानी पार्वती और उनके पुत्र गणेश व कार्त्तिकेय की मूर्त्ति तथा उनके वाहन नन्दी, मूषक और मयूर आदि की भी पूजा होने लगी । इनके अतिरिक्त विष्णु, लक्ष्मी, ब्रह्मा, राम और सीता तथा कृष्ण और रुक्मिणी, आदि राजाओं व रानियों को विष्णु का अवतार बनाकर पूजने लगे । पौराणिकों के शैव और वैष्णव दो प्रसिद्ध सम्प्रदाय बन गये, इनकी शाख-प्रशाखाएँ तो अनेक थीं । प्रत्येक अपने-अपने सम्प्रदाय के विस्तार के लिए प्रचार वा पुष्टि में लग गया । शैव सम्प्रदाय ने अपना शिव पुराण बना डाला और वैष्णवों ने विष्णु-पुराण की रचना कर डाली । इसी प्रकार सभी पुराण व अवतारों की रचना हुई तथा मूर्त्ति पूजा की जड़ जम गई । हरयाणा के लोग पहले ही शिव के भक्त थे । वे उनको अपना एक ऐतिहासिक आदर्श पुरुष मानते थे । अतः यहां के पौराणिकों के लिये यहां के लोगों से शिवजी की पूजा करवाना सहज और सरल कार्य था । अतः उन्होंने शिवजी महाराज की मूर्ति बनाकर शिवालयों में स्थापित कर दी और अपनी उदर पूर्ति के लिए पूजा करवाने लगे । इसी कारण सारे हरयाणा प्रान्त में शिवालय ही आपको दिखाई देंगे । विष्णु का मन्दिर आपको खोज करने से भी सम्भव है कहीं न मिल सके । जब कोई विवाह आदि संस्कार होता है तब भी यहां विघ्न निवारक शिव के पुत्र गणेश की पूजा की जाती है । सभी शिवालयों में शिव की पिण्डी, पार्वती, गणेश, नन्दी और कहीं-कहीं कार्तिकेय की भी मूर्ति मिलती है । इससे स्पष्ट सिद्ध होता है, कि यहां के लोग अपने पूर्वज, गणराज्य के संस्थापक शिवजी महाराज के प्रति अतीव प्रेम वा अटूट श्रद्धा रखते आये हैं । इस प्रेम वा अन्ध-विश्वास का लाभ उठाकर यहां के पौराणिक पुरोहितों ने अपने यजमानों से शिव और उनके परिवार की ही पूजा करवा डाली । इस प्रदेश में पाये जाने वाले पौराणिक उपासना मन्दिर सब शिवालय ही हैं, जो सिद्ध करते हैं कि हरयाणा-वासियों का शिव के साथ प्राचीन काल से ही घनिष्ट सम्बन्ध चला आता है । और यह सम्बंध शिव के साथ जितना गम्भीरतम है, उतना राम कृष्णादि किसी पूर्वज के साथ दिखाई नहीं देता ।

Tuesday, September 23, 2008

रुद्राभिषेकस्तोत्रम् (महाभारत)


ॐ सर्वदेवेभ्यो नम :

ॐ नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।

पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने ॥1॥

महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये ।

ईशानाय मखघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥2॥


कुमारगुरवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे ।

पिनाकिने हिवष्याय सत्याय विभवे सदा ॥3॥


विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते ।

नित्यनीलिशखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे ॥4॥


हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे ।

अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च ॥5॥

वृषध्वजाय मुण्डाय जिटने ब्रह्मचारिणे ।

तप्यमानाय सिलले ब्रह्मण्यायाजिताय च ॥6॥


विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते ।

नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा ॥7॥


ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शंकराय शिवाय च ।

नमोऽस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नम: ॥8॥


नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नम: ।

नम: सहस्रिशरसे सहस्रभुजमृत्यवे ।

सहस्रनेत्रपादाय नमोऽसंख्येयकर्मणे॥9॥


नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय च ।

भक्तानुकिम्पने नित्यं सिध्यतां नो वर: प्रभो ॥10॥


एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेव: सहार्जुन: ।

प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये ॥11॥

॥ इति शुभम् ॥

द्रौपदी Dropadi

जब पाण्डव तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देना चाहा। द्रोणाचार्य को द्रुपद के द्वारा किये गये अपने अपमान का स्मरण हो आया और उन्होंने राजकुमारों से कहा, "राजकुमारों! यदि तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पाञ्चाल नरेश द्रुपद को बन्दी बना कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।" गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र ले कर पाञ्चाल देश की ओर चले।

पाञ्चाल पहुँचने पर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, "गुरुदेव! आप पहले कौरवों को राजा द्रुपद से युद्ध करने की आज्ञा दीजिये। यदि वे द्रुपद को बन्दी बनाने में असफल रहे तो हम पाण्डव युद्ध करेंगे।" गुरु की आज्ञा मिलने पर दुर्योधन के नेतृत्व में कौरवों ने पाञ्चाल पर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों के मध्य भयंकर युद्ध होने लगा किन्तु अन्त में कौरव परास्त हो कर भाग निकले। कौरवों को पलायन करते देख पाण्डवों ने आक्रमण आरम्भ कर दिया। भीमसेन तथा अर्जुन के पराक्रम के समक्ष पाञ्चाल नरेश की सेना हार गई। अर्जुन ने आगे बढ़ कर द्रुपद को बन्दी बना लिया और गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष ले आये।

द्रुपद को बन्दी के रूप में देख कर द्रोणाचार्य ने कहा, "हे द्रुपद! अब तुम्हारे राज्य का स्वामी मैं हो गया हूँ। मैं तो तुम्हें अपना मित्र समझ कर तुम्हारे पास आया था किन्तु तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था। अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो?" द्रुपद ने लज्जा से सिर झुका लिया और अपनी भूल के लिये क्षमायाचना करते हुये बोले, "हे द्रोण! आपको अपना मित्र न मानना मेरी भूल थी और उसके लिये अब मेरे हृदय में पश्चाताप है। मैं तथा मेरा राज्य दोनों ही अब आपके आधीन हैं, अब आपकी जो इच्छा हो करें।" द्रोणाचार्य ने कहा, "तुमने कहा था कि मित्रता समान वर्ग के लोगों में होती है। अतः मैं तुमसे बराबरी का मित्र भाव रखने के लिये तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूँ।" इतना कह कर द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को सौंप दिया और शेष को स्वयं रख लिया।

गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, "इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।" महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान देदीप्यमान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के सँहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया।

भीष्म

एक दिन महाराज शान्तनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुये एक सुन्दर कन्या दृष्टिगत हुई। उसके अंग अंग से सुगन्ध निकल रही थी। महाराज ने उस कन्या से पूछा, "हे देवि! तुम कौन हो?" कन्या ने बताया, "महाराज! मेरा नाम सत्यवती है और मैं निषाद कन्या हूँ।" महाराज उसके रूप यौवन पर रीझ कर तत्काल उसके पिता के पास पहुँचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर धींवर (निषाद) बोला, "राजन्! मुझे अपनी कन्या का आपके साथ विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।।" निषाद के इन वचनों को सुन कर महाराज शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये।

सत्यवती के वियोग में महाराज शान्तनु व्याकुल रहने लगे। उनका शरीर दुर्बल होने लगा। महाराज की इस दशा को देख कर देवव्रत को बड़ी चिंता हुई। जब उन्हें मन्त्रियों के द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण ज्ञात हुआ तो वे तत्काल समस्त मन्त्रियों के साथ निषाद के घर जा पहुँचे और उन्होंने निषाद से कहा, "हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालान्तर में मेरी कोई सन्तान आपकी पुत्री के सन्तान का अधिकार छीन न पाये इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजन्म अविवाहित रहूँगा।" उनकी इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा, "हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।" इतना कह कर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मन्त्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।

देवव्रत ने अपनी माता सत्यवती को लाकर अपने पिता शान्तनु को सौंप दिया। पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र से कहा, "वत्स! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी प्रतिज्ञा की है जैसी कि न आज तक किसी ने किया है और न भविष्य में करेगा। मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू भीष्म कहलायेगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।"

शांतनु



शांतनु महाभारत के एक प्रमुख पात्र हैं। वे हस्तिनापुर के महाराज प्रतीप के पुत्र थे। उनका विवाह गंगा से हुआ था। जिससे उनका देवव्रत नाम का पुत्र हुआ। यही देवव्रत आगे चलकर महाभारत के प्रमुख पात्र भीष्म के नाम से जाने गए। शान्तनु का दूसरा विवाह निषाद कन्या सत्यवती से हुआ था। इस विवाह को कराने के लिए ही देवव्रत ने राजगद्दी पर न बैठने और आजीवन कुँवारा रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की थी, जिसके कारण उनका नाम भीष्म पड़ा। सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये।

वैदिक धर्म में आत्मा

धर्म में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि घट घट में भगवान का निवास है !' वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
जो आदमी सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक? वैदिक धर्म का मूल तत्व यही है। इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। उसे पाने का जो रास्ता है, उसका नाम है धर्म।
मनु ने धर्म के चार बताए हैं:
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विघं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्‌॥
धर्म की कसौटी चार हैं :
वेद,स्मृति, सदाचार और आत्मा को रुचने वाला आचरण

Sunday, September 21, 2008

हिंदू धर्म और गाँधी जी की विचारधारा

गाँधी जी की विचारधारा में विशुद्ध भारतीयता है .गाँधी जी का संपूर्ण जीवन धर्म पर हीआधारित था .उनोहोने अपने से लिखे एक अवतरण में ये कहा है की मई भारत माता के लिए सब कुछ बलिदान करने को तैयार हूँ लेकिन सत्य और अहिंसा नही ,क्योंकि हिंसा पूर्ण उपायों से लिया गया स्वराज्य भी हिंसापूर्ण हो जाएगा और हिंदुस्तान के लिए दुखद हो जाएगा .जब इन्हें सभी जातियों धर्मो को एक में पिरोने की आवश्कयता पड़ी तो इन्होने सभी वर्गों के सभी जातियों को बुलाया और सत्य बोलने का आग्रह किया (सत्य के लिए आग्रह) जो सत्याग्रह (जाति ,धर्म और संप्रदाय के बीच भेद भाव की भावना से बिल्कुल अलग हट कर कार्य करना ) कहलाया जिसके फलस्वरूप १९२१ में गाँधी जी को अपार सफलता मिली .खिलाफत आन्दोलन में गाँधी जी को मुसलमानों की हमदर्दी मिली जो की इनके सभी धर्मों के सामान भाव को प्रर्दशित करता है .१५ अगस्त १९४७ को जब की संपूर्ण देश में
इनका बक्ताब्या एक साथ कई भाषाओँ में प्रसारित होना था ,उस समय BBC के एक पत्रकार ने कुछ अंग्रेजी में पूछा तो गाँधी जी ने कहा की भूल जाओ की मै अंग्रेजी जनता हूँ ..उनका मानना था कि संपूर्ण मानव समुदाय को एक सूत्र में पिरोने के लिए केवल हिन्दी ही ऐसी भाषा है जिससे सर्ब -धर्म -समभाव स्थापित किया जा सकता है .

Friday, September 19, 2008

(Humanity & Religion) धर्म और मानवता

हिंदू कहता है धर्म मंदिर में है, सिक्ख कहता है कि मेरा धर्म गुरुद्वारे में है, मुसलमान कहता है कि मेरा धर्म मस्जिद में है। सभी अपने को बहुत बड़ा धार्मिक मानते हुए धर्म और संप्रदाय के नाम पर ही झगड़ रहे है। धर्म क्या है? धर्म की आवश्यकता क्यों है? यह सभी प्रश्न ऐसे है जिनका उत्तर हर मानव के हृदय में सदा विराजित होना चाहिए परन्तु इसका उत्तर तो दूर आज के मानव हृदय में यह प्रश्न ही नहीं है। वह पथ भ्रष्ट हो गया है। मानव सोचता है कि जो मैं कर रहा हूं वही धर्म है। धर्म को उसने व्यक्तिगत स्वार्थ से जोड़ लिया है। उसे कोई परवाह नहीं कि दूसरे के दिल में भी मेरे जैसे परमात्मा का ही वास है। धर्म मानव हृदय में बसता है जहां उस परम पिता परमात्मा का वास है परन्तु मानव रूपी धार्मिक स्थल को छोड़कर हम सब जगह ईश्वर को ही तलाश करता है और उसी को धर्म मानता है। जबकि अगर वास्तविकता में देखा जाए तो हर इंसान को मानवता के धर्म का ही पालन करना चाहिए क्योंकि मानवता ही सच्चा धर्म है। जीव मात्र पर दया और प्रेम का भाव रखना ही सच्चा धर्म है। सभी प्राणियों में उस परम पिता परमेश्वर का दर्शन करना ही सच्चा धर्म है।लेकीन आज ये सम्भव कहाँ है .ऐसे कितने लोग है जो इस भावः को समझते है .कहा जाता है की वह कम मत करो जो किसी के आत्मा में दुःख पैदा करे .लेकिन आज के समय में लोग वही करते है जो उन्हें अच्छा लगे चाहे उस कर्म के कारन किसी को अच्छा लगे या बुरा कोई फर्क नही पड़ता .आज मानव के सोच में फर्क आ गया है .लेकिन लोग कहते है कीकलियुग आ गया है .ये नही समझता की तुम्हारे सोच में कलियुग है न की इस ज़माने में तुमसे ही समाज बनता है तुमसे ही ये दूषित भी होता है जरुरत है आज समाज बदलने की नही अपने आप को बदलने की .जब तुम्हारा मन शांत और संत दोनों स्वभावों से युक्त हो जाएगा तो समाज का अपने आप कल्याण हो जाएगा .

Monday, September 15, 2008

भाई -चारा

1.हिंदुस्तान की सरकार को पहले यह तय कर लेनी चाहिए की हमारे नागरिक के अति रिक्त किसी का कोई अस्तित्व नही है और यदि एक मुस्लमान गुंडागीरी करता है तो वह भी एक नागरीक है ,उसके साथ भी वही व्यव्हार होना चाहिए जो और सभी जातियों के साथ !क्योंकि यह जाती का सबाल नही है ,राज्य की नजरों से हिंदू और मुस्लमान का फासला ख़त्म होना चाहिए !दोनों के बिच में भाई चारा तय हो ,शान्ति हो,इस तरह की कोसिसें बंद करनी चाहिए ,क्योंकि यह कोशिस खतरनाक है ,इसी कोशिश ने हिंदुस्तान पाकिस्तान को बत्बाया क्योंकि हम जितना जोर देते हैं की हिंदू मुस्लिम एक हो उतना ही हर दिया गया जोर यह बताता है की वे एक नही हैं ,यानि यह हालत वैसी ही है जैसे कोई आदमी किसी को भूलना चाहता है और उसे बार -बार याद करता है ! होता ये है की उसे भूलने की हर कोशिश बार -बार याद दिलाता है और उसकी यादें तजि होती जाति हैं !

Saturday, September 13, 2008

तुलसी का आत्मानुभव

तुलसी का आत्मानुभव राम से जोड़ता है. भक्ति , इन कवियों के सामाजिक अपमान के भीतर से पैदा हुई शक्ति है. जब सामाजिक उत्पीड़न का विकल्प समाज में न हो तब उसका विकल्प दर्शन या आध्यात्म में होता है. इसलिए इसे आधार बनाकर भक्तों ने अपने अनुभव के सांचे में अपने ईश्वर को ढाला. चूंकि भक्त मनुष्य थे इसलिए उनके मन में कमज़ोरियां भी थी, ईश्वर इन कमजोरियों से दूर थे इसलिए वे उनके आदर्श थे. ईश्वर के रूप में जिस आदर्श की खोज भक्त कवि करते हैं उसी अनुरूप वे संघर्ष करते हैं. अपने माता-पिता के प्रति निंदा का भाव तुलसीदास के मन में है लेकिन राम के मन में नहीं. भक्ति यदि एक सिरे पर सामाजिक विद्रोह है तो दूसरे स्तर पर आत्मसाधना भी. भक्ति सामाजिक भी है और व्यक्तिगत भी. भक्ति एक ऐसी प्रेरणा है जिसने पूरे मनुष्य को उसकी सम्पूर्णता में पाने की कोशिश की. "जो सहजै विषया तजै" यही सहज साधना है कबीर की. सहज होना साधना चीज़ है.
वाल्मीकि की कथा का प्राण था शोक. शोक से श्लोक पैदा होता था. भवभूति की आत्मा करूणा थी, तुलसीदास की आत्मा संघर्ष थी जो राम के पूरे जीवन में व्याप्त है. करूणा, शोक, संघर्ष राम की कथा का सार है. वह भी जीवन व्यापी रूप में किसी ईश्वर में नहीं है. ये तीनों मनुष्य की परिस्थितियां हैं. मानव जीवन है. इसलिए राम का तादात्म्य बैठता है. राम कथा में व्यक्त वेदना मनुष्य के जीवन व संबंधों से पैदा होती है. वेदना अनैतिक आदमी में उत्पन्न नहीं होती.

Friday, September 12, 2008

तीसरा ,चौथा और पंचम अध्याय

तीसरा अध्याय

अर्जुन बोले


 ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥३- १॥

हे केशव, अगर आप बुद्धि को कर्म से अधिक मानते हैं तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों न्योजित कर रहे हैं ॥


 व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥३- २॥

मिले हुऐ से वाक्यों से मेरी बुद्धि शंकित हो रही है । इसलिये मुझे वह एक रस्ता बताईये जो निष्चित प्रकार से मेरे लिये अच्छा हो ॥


श्रीभगवान बोले


 लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥३- ३॥

हे नि़ष्पाप, इस लोक में मेरे द्वारा दो प्रकार की निष्ठाऐं पहले बताई गयीं थीं । ज्ञान योग सन्यास से जुड़े लोगों के लिये और कर्म योग उनके लिये जो कर्म योग से जुड़े हैं ॥


 न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥३- ४॥

कर्म का आरम्भ न करने से मनुष्य नैष्कर्म सिद्धी नहीं प्राप्त कर सकता अतः कर्म योग के अभ्यास में कर्मों का करना जरूरी है । और न ही केवल त्याग कर देने से सिद्धी प्राप्त होती है ॥


 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥३- ५॥

कोई भी एक क्षण के लिये भी कर्म किये बिना नहीं बैठ सकता । सब प्रकृति से पैदा हुऐ गुणों से विवश होकर कर्म करते हैं ॥


 कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥३- ६॥

कर्म कि इन्द्रीयों को तो रोककर, जो मन ही मन विषयों के बारे में सोचता है उसे मिथ्या अतः ढोंग आचारी कहा जाता है ॥


 यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥३- ७॥

हे अर्जुन, जो अपनी इन्द्रीयों और मन को नियमित कर कर्म का आरम्भ करते हैं, कर्म योग का आसरा लेते हुऐ वह कहीं बेहतर हैं ॥


 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥३- ८॥

जो तुम्हारा काम है उसे तुम करो क्योंकि कर्म से ही अकर्म पैदा होता है, मतलब कर्म योग द्वारा कर्म करने से ही कर्मों से छुटकारा मिलता है । कर्म किये बिना तो यह शरीर की यात्रा भी संभव नहीं हो सकती । शरीर है तो कर्म तो करना ही पड़ेगा ॥


 यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥३- ९॥

केवल यज्ञा समझ कर तुम कर्म करो हे कौन्तेय वरना इस लोक में कर्म बन्धन का कारण बनता है । उसी के लिये कर्म करते हुऐ तुम संग से मुक्त रह कर समता से रहो ॥


 सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥३- १०॥

यज्ञ के साथ ही बहुत पहले प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की और कहा की इसी प्रकार कर्म यज्ञ करने से तुम बढोगे और इसी से तुम्हारे मन की कामनाऐं पूरी होंगी ॥


 देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥३- ११॥

तुम देवताओ को प्रसन्न करो और देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे, इस प्रकार परस्पर एक दूसरे का खयाल रखते तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे ॥


 इष्टान्भोगान्हि वह देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥३- १२॥

यज्ञों से संतुष्ट हुऐ देवता तुम्हें मन पसंद भोग प्रदान करेंगे । जो उनके दिये हुऐ भोगों को उन्हें दिये बिना खुद ही भोगता है वह चोर है ॥


 यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात् ॥३- १३॥

जो यज्ञ से निकले फल का आनंद लेते हैं वह सब पापों से मुक्त हो जाते हैं लेकिन जो पापी खुद पचाने को लिये ही पकाते हैं वे पाप के भागीदार बनते हैं ॥


 अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥३- १४॥

जीव अनाज से होते हैं । अनाज बिरिश से होता है । और बिरिश यज्ञ से होती है । यज्ञ कर्म से होता है ॥ (यहाँ प्राकृति के चलने को यज्ञ कहा गया है)


 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥३- १५॥

कर्म ब्रह्म से सम्भव होता है और ब्रह्म अक्षर से होता है । इसलिये हर ओर स्थित ब्रह्म सदा ही यज्ञ में स्थापित है ।


 एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥३- १६॥

इस तरह चल रहे इस चक्र में जो हिस्सा नहीं लेता, सहायक नहीं होता, अपनी ईन्द्रीयों में डूबा हुआ वह पाप जीवन जीने वाला, व्यर्थ ही, हे पार्थ, जीता है ॥


 यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥३- १७॥

लेकिन जो मानव खुद ही में स्थित है, अपने आप में ही तृप्त है, अपने आप में ही सन्तुष्ट है, उस के लिये कोई भी कार्य नहीं बचता ॥


 नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥३- १८॥

न उसे कभी किसी काम के होने से कोई मतलब है और न ही न होने से । और न ही वह किसी भी जीव पर किसी भी मतलब के लिये आश्रय लेता है ॥


 तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥३- १९॥

इसलिये कर्म से जुड़े बिना सदा अपना कर्म करते हुऐ समता का अचरण करो ॥ बिना जुड़े कर्म का आचरण करने से पुरुष परम को प्राप्त कर लेता है ॥


 कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥३- २०॥

कर्म के द्वारा ही जनक आदि सिद्धी में स्थापित हुऐ थे । इस लोक समूह, इस संसार के भले के लिये तुम्हें भी कर्म करना चाहिऐ ॥


 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३- २१॥

क्योंकि जो ऐक श्रेष्ठ पुरुष करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं । वह जो करता है उसी को प्रमाण मान कर अन्य लोग भी पीछे वही करते हैं ॥


 न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥३- २२॥

हे पार्थ, तीनो लोकों में मेरे लिये कुछ भी करना वाला नहीं है । और न ही कुछ पाने वाला है लेकिन फिर भी मैं कर्म में लगता हूँ ॥


 यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥३- २३॥

हे पार्थ, अगर मैं कर्म में नहीं लगूँ तो सभी मनुष्य भी मेरे पीछे वही करने लगेंगे ॥


 उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥३- २४॥

अगर मै कर्म न करूँ तो इन लोकों में तबाही मच जायेगी और मैं इस प्रजा का नाशकर्ता हो जाऊँगा ॥


 सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥३- २५॥

जैसे अज्ञानी लोग कर्मों से जुड़ कर कर्म करते हैं वैसे ही ज्ञानमन्दों को चाहिये कि कर्म से बिना जुड़े कर्म करें । इस संसार चक्र के लाभ के लिये ही कर्म करें ।


 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥३- २६॥

जो लोग कर्मो के फलों से जुड़े है, कर्मों से जुड़े हैं ज्ञानमंद उनकी बुद्धि को न छेदें । सभी कामों को कर्मयोग बुद्धि से युक्त होकर समता का आचरण करते हुऐ करें ॥


 प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥३- २७॥

सभी कर्म प्रकृति में स्थित गुणों द्वारा ही किये जाते हैं । लेकिन अहंकार से विमूढ हुआ मनुष्य स्वय्म को ही कर्ता समझता है ॥


 तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥३- २८॥

हे महाबाहो, गुणों और कर्मों के विभागों को सार तक जानने वाला, यह मान कर की गुण ही गुणों से वर्त रहे हैं, जुड़ता नहीं ॥


 प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥३- २९॥

प्रकृति के गुणों से मूर्ख हुऐ, गुणों के कारण हुऐ उन कर्मों से जुड़े रहते है । सब जानने वाले को चाहिऐ कि वह अधूरे ज्ञान वालों को विचलित न करे ॥


 मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३- ३०॥

सभी कर्मों को मेरे हवाले कर, अध्यात्म में मन को लगाओ । आशाओं से मुक्त होकर, "मै" को भूल कर, बुखार मुक्त होकर युद्ध करो ॥


 यह में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥३- ३१॥

मेरे इस मत को, जो मानव श्रद्धा और बिना दोष निकाले सदा धारण करता है और मानता है, वह कर्मों से मु्क्ती प्राप्त करता है ॥


 यह त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥३- ३२॥

जो इसमें दोष निकाल कर मेरे इस मत का पालन नहीं करता, उसे तुम सारे ज्ञान से वंचित, मूर्ख हुआ और नष्ट बुद्धी जानो ॥


 सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३- ३३॥

सब वैसा ही करते है जैसी उनका स्वभाव होता है, चाहे वह ज्ञानवान भी हों । अपने स्वभाव से ही सभी प्राणी होते हैं फिर सयंम से क्या होगा ॥


 इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥३- ३४॥

इन्द्रियों के लिये उन के विषयों में खींच और घृणा होती है । इन दोनो के वश में मत आओ क्योंकि यह रस्ते के रुकावट हैं ॥


 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३- ३५॥

अपना काम ही अच्छा है, चाहे उसमे कमियाँ भी हों, किसी और के अच्छी तरह किये काम से । अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है, किसी और के काम से चाहे उसमे डर न हो ॥

अर्जुन बोले

 अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥३- ३६॥

लेकिन, हे वार्ष्णेय, किसके जोर में दबकर पुरुष पाप करता है, अपनी मरजी के बिना भी, जैसे कि बल से उससे पाप करवाया जा रहा हो ॥


श्रीभगवान बोले

 काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥३- ३७॥

इच्छा और गुस्सा जो रजो गुण से होते हैं, महा विनाशी, महापापी इसे तुम यहाँ दुश्मन जानो ॥


 धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥३- ३८॥

जैसे आग को धूआँ ढक लेता है, शीशे को मिट्टी ढक लेती है, शिशू को गर्भ ढका लेता है, उसी तरह वह इनसे ढका रहता है ॥

(क्या ढका रहता है, अगले श्लोक में है )


 आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥३- ३९॥

यह ज्ञान को ढकने वाला ज्ञानमंद पुरुष का सदा वैरी है, इच्छा का रूप लिऐ, हे कौन्तेय, जिसे पूरा करना संभव नहीं ॥


 इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥३- ४०॥

इन्द्रीयाँ मन और बुद्धि इसके स्थान कहे जाते हैं । यह देहधिरियों को मूर्ख बना उनके ज्ञान को ढक लेती है ॥


 तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥३- ४१॥

इसलिये, हे भरतर्षभ, सबसे पहले तुम अपनी इन्द्रीयों को नियमित करो और इस पापमयी, ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाली इच्छा का त्याग करो ॥


 इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥३- ४२॥

इन्द्रीयों को उत्तम कहा जाता है, और इन्द्रीयों से उत्तम मन है, मन से ऊपर बुद्धि है और बुद्धि से ऊपर आत्मा है ॥


 एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥३- ४३॥


इस प्रकार स्वयंम को बुद्धि से ऊपर जान कर, स्वयंम को स्वयंम के वश में कर, हे महाबाहो, इस इच्छा रूपी शत्रु, पर जीत प्राप्त कर लो, जिसे जीतना कठिन है ॥



॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥


चौथा अध्याय

श्रीभगवानुवाच

 इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥४-१॥

इस अव्यय योगा को मैने विवस्वान को बताया । विवस्वान ने इसे मनु को कहा । और मनु ने इसे इक्ष्वाक को बताया ॥


 एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥४-२॥

हे परन्तप, इस तरह यह योगा परम्परा से राजर्षीयों को प्राप्त होती रही । लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, बहुत समय बाद, इसका ज्ञान नष्ट हो गया ॥


 स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥४-३॥

वही पुरातन योगा को मैने आज फिर तुम्हे बताया है । तुम मेरे भक्त हो, मेरे मित्र हो और यह योगा एक उत्तम रहस्य है ॥


अर्जुन उवाच

 अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४-४॥

आपका जन्म तो अभी हुआ है, विवस्वान तो बहुत पहले हुऐ हैं । कैसे मैं यह समझूँ कि आप ने इसे शुरू मे बताया था ॥

श्रीभगवानुवाच

 बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥४-५॥

अर्जुन, मेरे बहुत से जन्म बीत चुके हैं और तुम्हारे भी । उन सब को मैं तो जानता हूँ पर तुम नहीं जानते, हे परन्तप ॥

 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥४-६॥

यद्यपि मैं अजन्मा और अव्यय, सभी जीवों का महेश्वर हूँ, तद्यपि मैं अपनी प्रकृति को अपने वश में कर अपनी माया से ही संभव होता हूँ ॥

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥

हे भारत, जब जब धर्म का लोप होता है, और अधर्म बढता है, तब तब मैं सवयंम सवयं की रचना करता हूँ ॥

 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

साधू पुरुषों के कल्याण के लिये, और दुष्कर्मियों के विनाश के लिये, तथा धर्म कि स्थापना के लिये मैं युगों योगों मे जन्म लेता हूँ ॥

 जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥४-९॥

मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं, इसे जो सारवत जानता है, देह को त्यागने के बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता, बल्कि वो मेरे पास आता है, हे अर्जुन ॥


 वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥४-१०॥

लगाव, भय और क्रोध से मुक्त, मुझ में मन लगाये हुऐ, मेरा ही आश्रय लिये लोग, ज्ञान और तप से पवित्र हो, मेरे पास पहुँचते हैं ॥


 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥४-११॥

जो मेरे पास जैसे आता है, मैं उसे वैसे ही मिलता हूँ । हे पार्थ, सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरा ही अनुगमन करते हैं ॥

 काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥४-१२॥

जो किये काम मे सफलता चाहते हैं वो देवताओ का पूजन करते हैं । इस मनुष्य लोक में कर्मों से सफलता शीघ्र ही मिलती है ॥

 चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥४-१३॥

ये जारों वर्ण मेरे द्वारा ही रचे गये थे, गुणों और कर्मों के विभागों के आधार पर । इन कर्मों का कर्ता होते हुऐ भी परिवर्तन रहित मुझ को तुम अकर्ता ही जानो ॥

 न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥४-१४॥

न मुझे कर्म रंगते हैं और न ही मुझ में कर्मों के फलों के लिये कोई इच्छा है । जो मुझे इस प्रकार जानता है, उसे कर्म नहीं बाँधते ॥

 एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥४-१५॥

पहले भी यह जान कर ही मोक्ष की इच्छा रखने वाले कर्म करते थे । इसलिये तुम भी कर्म करो, जैसे पूर्वों ने पुरातन समय में किये ॥


 किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥४-१६॥

कर्म कया है और अकर्म कया है, विद्वान भी इस के बारे में मोहित हैं । तुम्हे मैं कर्म कया है, ये बताता हूँ जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्ति पा लोगे ॥

 कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥४-१७॥

कर्म को जानना जरूरी है और न करने लायक कर्म को भी । अकर्म को भी जानना जरूरी है, क्योंकि कर्म रहस्यमयी है ॥

 कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥४-१८॥

कर्म करने मे जो अकर्म देखता है, और कर्म न करने मे भी जो कर्म होता देखता है, वही मनुष्य बुद्धिमान है और इसी बुद्धि से युक्त होकर वो अपने सभी कर्म करता है ॥

 यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥४-१९॥

जिसके द्वारा आरम्भ किया सब कुछ इच्छा संकल्प से मुक्त होता है, जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में जल कर राख हो गये हैं, उसे ज्ञानमंद लोग बुद्धिमान कहते हैं ॥

 त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥४-२०॥

कर्म के फल से लगाव त्याग कर, सदा तृप्त और आश्रयहीन रहने वाला, कर्म मे लगा हुआ होकर भी, कभी कुछ नहीं करता है ॥


 निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४-२१॥

मोघ आशाओं से मुक्त, अपने चित और आत्मा को वश में कर, घर सम्पत्ति आदि मिनसिक परिग्रहों को त्याग, जो केवल शरीर से कर्म करता है, वो कर्म करते हुऐ भी पाप नहीं प्राप्त करता ॥


 यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥४-२२॥

सवयंम ही चल कर आये लाभ से ही सन्तुष्ट, द्विन्द्वता से ऊपर उठा हुआ, और दिमागी जलन से मुक्त, जो सफलता असफलता मे एक सा है, वो कार्य करता हुआ भी नहीं बँधता ॥

 गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥४-२३॥

संग छोड़ जो मुक्त हो चुका है, जिसका चित ज्ञान में स्थित है, जो केवल यज्ञ के लिये कर्म कर रहा है, उसके संपूर्ण कर्म पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं ॥


 ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४-२४॥

ब्रह्म ही अर्पण करने का साधन है, ब्रह्म ही जो अर्पण हो रहा है वो है, ब्रह्म ही वो अग्नि है जिसमे अर्पण किया जा रहा है, और अर्पण करने वाला भी ब्रह्म ही है । इस प्रकार कर्म करते समय जो ब्रह्म मे समाधित हैं, वे ब्रह्म को ही प्राप्त करते हैं ॥


 दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥४-२५॥

कुछ योगी यज्ञ के द्वारा देवों की पूजा करते हैं । और कुछ ब्रह्म की ही अग्नि मे यज्ञ कि आहुति देते हैं ॥

 श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥४-२६॥

अन्य सुनने आदि इन्द्रियों की संयम अग्नि मे आहुति देते हैं । और अन्य शब्दादि विषयों कि इन्द्रियों रूपी अग्नि मे आहूति देते हैं ॥

 सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥४-२७॥

और दूसरे कोई, सभी इन्द्रियों और प्राणों को कर्म मे लगा कर, आत्म संयम द्वारा, ज्ञान से जल रही, योग अग्नि मे अर्पित करते हैं


 द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥४-२८॥

इस प्रकार कोई धन पदार्थों द्वारा यज्ञ करते हैं, कोई तप द्वारा यज्ञ करते हैं, कोई कर्म योग द्वारा यज्ञ करते हैं और कोई स्वाध्याय द्वारा ज्ञान यज्ञ करते हैं, अपने अपने व्रतों का सावधानि से पालन करते हुऐ ॥


 अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥४-२९॥

और भी कई, अपान में प्राण को अर्पित कर और प्राण मे अपान को अर्पित कर, इस प्रकार प्राण और अपान कि गतियों को नियमित कर, प्राणायाम मे लगते हैँ ॥

 अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥४-३०॥

अन्य कुछ, अहार न ले कर, प्राणों को प्राणों मे अर्पित करते हैं । ये सभी ही, यज्ञों द्वारा क्षीण पाप हुऐ, यज्ञ को जानने वाले हैं ॥

 यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥४-३१॥

यज्ञ से उत्पन्न इस अमृत का जो पान करते हैं अर्थात जो यज्ञ कर पापों को क्षीण कर उससे उत्पन्न शान्ति को प्राप्त करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं । जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिये यह लोक ही सुखमयी नहीं है, तो और कोई लोक भी कैसे हो सकता है, हे कुरुसत्तम ॥


 एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥४-३२॥

इस प्रकार ब्रह्म से बहुत से यज्ञों का विधान हुआ । इन सभी को तुम कर्म से उत्पन्न हुआ जानो और ऍसा जान जाने पर तुम भी कर्म से मोक्ष पा जाओगे ॥

 श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥४-३३॥

हे परन्तप, धन आदि पदार्थों के यज्ञ से ज्ञान यज्ञ ज्यादा अच्छा है । सारे कर्म पूर्ण रूप से ज्ञान मिल जाने पर अन्त पाते हैं ॥

 तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥४-३४॥

सार को जानने वाले ज्ञानमंदों को तुम प्रणाम करो, उनसे प्रशन करो और उनकी सेवा करो ॥ वे तुम्हे ज्ञान मे उपदेश देंगे ॥

 यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥४-३५॥

हे पाण्डव, उस ज्ञान में, जिसे जान लेने पर तुम फिर से मोहित नहीं होगे, और अशेष सभी जीवों को तुम अपने में अन्यथा मुझ मे देखोगे ॥


 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥४-३६॥

यदि तुम सभी पाप करने वालों से भी अधिक पापी हो, तब भी ज्ञान रूपी नाव द्वारा तुम उन सब पापों को पार कर जाओगे ॥

 यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥४-३७॥

जैसे समृद्ध अग्नि भस्म कर डालती है, हे अर्जुन, उसी प्रकार ज्ञान अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर डालती है ॥

 न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥४-३८॥

ज्ञान से अधिक पवित्र इस संसार पर और कुछ नहीं है । तुम सवयंम ही, योग में सिद्ध हो जाने पर, समय के साथ अपनी आत्मा में ज्ञान को प्राप्त करोगे ॥

 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥४-३९॥

श्रद्धा रखने वाले, अपनी इन्द्रियों का संयम कर ज्ञान लभते हैं । और ज्ञान मिल जाने पर, जलद ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥

 अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४-४०॥

ज्ञानहीन और श्रद्धाहीन, शंकाओं मे डूबी आत्मा वालों का विनाश हो जाता है । न उनके लिये ये लोक है, न कोई और न ही शंका में डूबी आत्मा को कोई सुख है ॥

 योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥४-४१॥

योग द्वारा कर्मों का त्याग किये हुआ, ज्ञान द्वारा शंकाओं को छिन्न भिन्न किया हुआ, आत्म मे स्थित व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते, हे धनंजय ॥

 तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४-४२॥

इसलिये अज्ञान से जन्मे इस संशय को जो तुम्हारे हृदय मे घर किया हुआ है, ज्ञान रूपी तल्वार से चीर डालो, और योग को धारण कर उठो हे भारत ॥


॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥



पाँचवां अध्याय

अर्जुन उवाच

 संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥५- १॥

हे कृष्ण, आप कर्मों के त्याग की प्रशंसा कर रहे हैं और फिर योग द्वारा कर्मों को करने की भी । इन दोनों में से जो ऐक मेरे लिये ज्यादा अच्छा है वही आप निश्चित कर के मुझे कहिये ॥


श्रीभगवानुवाच

 संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥५- २॥

संन्यास और कर्म योग, ये दोनो ही श्रेय हैं, परम की प्राप्ति कराने वाले हैं । लेकिन कर्मों से संन्यास की जगह, योग द्वारा कर्मों का करना अच्छा है ॥

 ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५- ३॥

उसे तुम सदा संन्यासी ही जानो जो न घृणा करता है और न इच्छा करता है । हे महाबाहो, द्विन्दता से मुक्त व्यक्ति आसानी से ही बंधन से मुक्त हो जाता है ॥

 सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥५- ४॥

संन्यास अथवा सांख्य को और कर्म योग को बालक ही भिन्न भिन्न देखते हैं, ज्ञानमंद नहीं । किसी भी एक में ही स्थित मनुष्य दोनो के ही फलों को समान रूप से पाता है ॥

 यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति ॥५- ५॥

सांख्य से जो स्थान प्राप्त होता है, वही स्थान योग से भी प्राप्त होता है । जो सांख्य और कर्म योग को एक ही देखता है, वही वास्तव में देखता है ॥

 संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥५- ६॥

संन्यास अथवा त्याग, हे महाबाहो, कर्म योग के बिना प्राप्त करना कठिन है । लेकिन योग से युक्त मुनि कुछ ही समय मे ब्रह्म को प्राप्त कर लेते है ॥

 योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥५- ७॥

योग से युक्त हुआ, शुद्ध आत्मा वाला, सवयंम और अपनी इन्द्रियों पर जीत पाया हुआ, सभी जगह और सभी जीवों मे एक ही परमात्मा को देखता हुआ, ऍसा मुनि कर्म करते हुऐ भी लिपता नहीं है ॥

 नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥५- ८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥५- ९॥

सार को जानने वाला यही मानता है कि वो कुछ नहीं कर रहा । देखते हुऐ, सुनते हुऐ, छूते हुऐ, सूँघते हुऐ, खाते हुऐ, चलते फिरते हुऐ, सोते हुऐ, साँस लेते हुऐ, बोलते हुऐ, छोड़ते या पकड़े हुऐ, यहाँ तक कि आँखें खोलते या बंद करते हुऐ, अर्थात कुछ भी करते हुऐ, वो इसी भावना से युक्त रहता है कि वो कुछ नहीं कर रहा । वो यही धारण किये रहता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ वर्त रही हैं ॥


 ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥५- १०॥

कर्मों को ब्रह्म के हवाले कर, संग को त्याग कर जो कार्य करता है, वो पाप मे नहीं लिपता, जैसे कमल का पत्ता पानी में भी गीला नहीं होता ॥


 कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥५- ११॥

योगी, आत्मशुद्धि के लिये, केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करते हैं, संग को त्याग कर ॥


 युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥५- १२॥

कर्म के फल का त्याग करने की भावना से युक्त होकर, योगी परम शान्ति पाता है । लेकिन जो ऍसे युक्त नहीं है, इच्छा पूर्ति के लिये कर्म के फल से जुड़े होने के कारण वो बँध जाता है ॥

 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥५- १३॥

सभी कर्मों को मन से त्याग कर, देही इस नौं दरवाजों के देश मतलब इस शरीर में सुख से बसती है । न वो कुछ करती है और न करवाती है ॥

 न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥५- १४॥

प्रभु, न तो कर्ता होने कि भावना की, और न कर्म की रचना करते हैं । न ही वे कर्म का फल से संयोग कराते हैं । यह सब तो सवयंम के कारण ही होता है ।

 नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥५- १५॥

न भगवान किसी के पाप को ग्रहण करते हैं और न किसी के अच्छे कार्य को । ज्ञान को अज्ञान ढक लेता है, इसिलिये जीव मोहित हो जाते हैं ॥

 ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥५- १६॥

जिन के आत्म मे स्थित अज्ञान को ज्ञान ने नष्ट कर दिया है, वह ज्ञान, सूर्य की तरह, सब प्रकाशित कर देता है ॥

 तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥५- १७॥

ज्ञान द्वारा उनके सभी पाप धुले हुऐ, उसी ज्ञान मे बुद्धि लगाये, उसी मे आत्मा को लगाये, उसी मे श्रद्धा रखते हुऐ, और उसी में डूबे हुऐ, वे ऍसा स्थान प्राप्त करते हैं जिस से फिर लौट कर नहीं आते ॥

 विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥५- १८॥

ज्ञानमंद व्यक्ति एक विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण को, गाय को, हाथी को, कुत्ते को और एक नीच व्यक्ति को, इन सभी को समान दृष्टि से देखता है ।

 इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥५- १९॥

जिनका मन समता में स्थित है वे यहीं इस जन्म मृत्यु को जीत लेते हैं । क्योंकि ब्रह्म निर्दोष है और समता पूर्ण है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं ।

 न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥५- २०॥

न प्रिय लगने वाला प्राप्त कर वे प्रसन्न होते हैं, और न अप्रिय लगने वाला प्राप्त करने पर व्यथित होते हैं । स्थिर बुद्धि वाले, मूर्खता से परे, ब्रह्म को जानने वाले, एसे लोग ब्रह्म में ही स्थित हैं ।


 बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत् सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥५- २१॥

बाहरी स्पर्शों से न जुड़ी आत्मा, अपने आप में ही सुख पाती है । एसी, ब्रह्म योग से युक्त, आत्मा, कभी न अन्त होने वाले निरन्तर सुख का आनन्द लेती है ।


 ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥५- २२॥

बाहरी स्पर्श से उत्तपन्न भोग तो दुख का ही घर हैं । शुरू और अन्त हो जाने वाले ऍसे भोग, हे कौन्तेय, उनमें बुद्धिमान लोग रमा नहीं करते ।


 शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥५- २३॥

यहाँ इस शरीर को त्यागने से पहले ही जो काम और क्रोध से उत्तपन्न वेगों को सहन कर पाले में सफल हो पाये, ऍसा युक्त नर सुखी है ।


 योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥५- २४॥

जिसकी अन्तर आत्मा सुखी है, अन्तर आत्मा में ही जो तुष्ट है, और जिसका अन्त करण प्रकाशमयी है, ऍसा योगी ब्रह्म निर्वाण प्राप्त कर, ब्रह्म में ही समा जाता है ।

 लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥५- २५॥

ॠषी जिनके पाप क्षीण हो चुके हैं, जिनकी द्विन्द्वता छिन्न हो चुकी है, जो संवयम की ही तरह सभी जीवों के हित में रमे हैं, वो ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करते हैं ।


 कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥५- २६॥

काम और क्रोध को त्यागे, साधना करते हुऐ, अपने चित को नियमित किये, आत्मा का ज्ञान जिनहें हो चुका है, वे यहाँ होते हुऐ भी ब्रह्म निर्वाण में ही स्थित हैं ।

 स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥५- २७॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥५- २८॥

बाहरी स्पर्शों को बाहर कर, अपनी दृष्टि को अन्दर की ओर भ्रुवों के मध्य में लगाये, प्राण और अपान का नासिकाओं में एक सा बहाव कर, इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियमित कर, ऍसा मुनि जो मोक्ष प्राप्ति में ही लगा हुआ है, इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त, वह सदा ही मुक्त है ।

 भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥५- २९॥

मुझे ही सभी यज्ञों और तपों का भोक्ता, सभी लोकों का महान ईश्वर, और सभी जीवों का सुहृद जान कर वह शान्ति को प्राप्त करता है ।


॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥

दूसरा अध्याय


श्रीमद्भगवद्गीता

दूसरा अध्याय

संजय बोले

 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२- १॥

तब चिंता और विशाद में डूबे अर्जुन को, जिसकी आँखों में आँसू भर आऐ थे, मधुसूदन ने यह वाक्य कहे ॥


श्रीभगवान बोले

 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२- २॥

हे अर्जुन, यह तुम किन विचारों में डूब रहे हो जो इस समय गलत हैं और स्वर्ग और कीर्ती के बाधक हैं ॥


 क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२- ३॥

तुम्हारे लिये इस दुर्बलता का साथ लेना ठीक नहीं । इस नीच भाव, हृदय की दुर्बलता, का त्याग करके उठो हे परन्तप ॥


अर्जुन बोले

 कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२- ४॥

हे अरिसूदन, मैं किस प्रकार भीष्म, संख्य और द्रोण से युध करुँगा । वे तो मेरी पूजा के हकदार हैं ॥


 गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥२- ५॥

इन महानुभाव गुरुयों की हत्या से तो भीख माँग कर जीना ही बेहतर होगा । इन को मारकर जो भोग हमें प्राप्त होंगे वे सब तो खून से रँगे होंगे ॥


 न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२- ६॥

हम तो यह भी नहीं जानते की हम जीतेंगे याँ नहीं, और यह भी नहीं की दोनो में से बेहतर क्या है, उनका जीतना या हमारा, क्योंकि जिन्हें मार कर हम जीना भी नहीं चाहेंगे वही धार्तराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़ें हैं ॥


 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२- ७॥

इस दुख चिंता ने मेरे स्वभाव को छीन लिया है और मेरा मन शंका से घिरकर सही धर्म को नहीं हेख पा रहा है । मैं आप से पूछता हूँ, जो मेरे लिये निष्चित प्रकार से अच्छा हो वही मुझे बताइये ॥ मैं आप का शिष्य हूँ और आप की ही शरण लेता हूँ ॥


 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥२- ८॥

मुझे नहीं दिखता कैसे इस दुखः का, जो मेरी इन्द्रीयों को सुखा रहा है, अन्त हो सकता है, भले ही मुझे इस भूमी पर अति समृद्ध और शत्रुहीन राज्य यां देवतायों का भी राज्यपद क्यों न मिल जाऐ ॥

संजय बोले

 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२- ९॥

हृषिकेश, श्री गोविन्द जी को परन्तप अर्जुन, गुडाकेश यह कह कर चुप हो गये कि मैं युध नहीं करुँगा ॥

 तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥२- १०॥

हे भारत, दो सेनाओं के बीच में शोक और दुख से घिरे अर्जुन को प्रसन्नता से हृषीकेश ने यह बोला ॥


श्रीभगवान बोले

 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२- ११॥

जिन के लिये शोक नहीं करना चाहिये उनके लिये तुम शोक कर रहे हो और बोल तुम बुद्धीमानों की तरहँ रहे हो । ज्ञानी लोग न उन के लिये शोक करते है जो चले गऐ और न उन के लिये जो हैं ॥


 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥२- १२॥

न तुम्हारा न मेरा और न ही यह राजा जो दिख रहे हैं इनका कभी नाश होता है ॥ और यह भी नहीं की हम भविष्य मे नहीं रहेंगे ॥

 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२- १३॥

आत्मा जैसे देह के बाल, युवा यां बूढे होने पर भी वैसी ही रहती है उसी प्रकार देह का अन्त होने पर भी वैसी ही रहती है ॥ बुद्धीमान लोग इस पर व्यथित नहीं होते ॥


 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२- १४॥

हे कौन्तेय, सरदी गरमी सुखः दुखः यह सब तो केवल स्पर्श मात्र हैं । आते जाते रहते हैं, हमेशा नहीं रहते, इन्हें सहन करो, हे भारत ॥


 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२- १५॥

हे पुरुषर्षभ, वह धीर पुरुष जो इनसे व्यथित नहीं होता, जो दुख और सुख में एक सा रहता है, वह अमरता के लायक हो जाता है ॥


 नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२- १६॥

न असत कभी रहता है और सत न रहे ऐसा हो नहीं सकता । इन होनो की ही असलीयत वह देख चुके हैं जो सार को देखते हैं ॥


 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२- १७॥

तुम यह जानो कि उसका नाश नहीं किया जा सकता जिसमे यह सब कुछ स्थित है । क्योंकि जो अमर है उसका नाश करना किसी के बस में नहीं ॥


 अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२- १८॥

यह देह तो मरणशील है, लेकिन शरीर में बैठने वाला अन्तहीन कहा जाता है । इस आत्मा का न तो अन्त है और न ही इसका कोई मेल है, इसलिऐ युद्ध करो हे भारत ॥


 य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२- १९॥

जो इसे मारने वाला जानता है या फिर जो इसे मरा मानता है, वह दोनों ही नहीं जानते । यह न मारती है और न मरती है ॥


 न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२- २०॥

यह न कभी पैदा होती है और न कभी मरती है । यह तो अजन्मी, अन्तहीन, शाश्वत और अमर है । सदा से है, कब से है । शरीर के मरने पर भी इसका अन्त नहीं होता ॥


 वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२- २१॥

हे पार्थ, जो पुरुष इसे अविनाशी, अमर और जन्महीन, विकारहीन जानता है, वह किसी को कैसे मार सकता है यां खुद भी कैसे मर सकता है ॥


 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२- २२॥

जैसे कोई व्यक्ती पुराने कपड़े उतार कर नऐ कपड़े पहनता है, वैसे ही शरीर धारण की हुई आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर प्राप्त करती है ॥


 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२- २३॥

न शस्त्र इसे काट सकते हैं और न ही आग इसे जला सकती है । न पानी इसे भिगो सकता है और न ही हवा इसे सुखा सकती है ॥


 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२- २४॥

यह अछेद्य है, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती, सुखाई नहीं जा सकती । यह हमेशा रहने वाली है, हर जगह है, स्थिर है, अन्तहीन है ॥


 अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२- २५॥

यह दिखती नहीं है, न इसे समझा जा सकता है । यह बदलाव से रहित है, ऐसा कहा जाता है । इसलिये इसे ऐसा जान कर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ ॥


 अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२- २६॥

हे महाबाहो, अगर तुम इसे बार बार जन्म लेती और बार बार मरती भी मानो, तब भी, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ ॥


 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२- २७॥

क्योंकि जिसने जन्म लिया है, उसका मरना निष्चित है । मरने वाले का जन्म भी तय है । जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता उसके बारे तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ ॥


 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२- २८॥

हे भारत, जीव शुरू में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं । इस में दुखी होने की क्या बात है ॥



 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२- २९॥

कोई इसे आश्चर्य से देखता है, कोई इसके बारे में आश्चर्य से बताता है, और कोई इसके बारे में आश्चर्यचित होकर सुनता है, लेकिन सुनने के बाद भी कोई इसे नहीं जानता ॥



 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२- ३०॥

हे भारत, हर देह में जो आत्मा है वह नित्य है, उसका वध नहीं किया जा सकता । इसलिये किसी भी जीव के लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥


 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२- ३१॥

अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढकर ऐक क्षत्रीय के लिये कुछ नहीं है ॥



 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२- ३२॥

हे पार्थ, सुखी हैं वे क्षत्रिय जिन्हें ऐसा युद्ध मिलता है जो स्वयंम ही आया हो और स्वर्ग का खुला दरवाजा हो ॥



 अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२- ३३॥

लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे ॥



 अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२- ३४॥

तुम्हारे अन्तहीन अपयश की लोग बातें करेंगे । ऐसी अकीर्ती एक प्रतीष्ठित मनुष्य के लिये मृत्यु से भी बढ कर है ॥



 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२- ३५॥

महारथी योद्धा तुम्हें युद्ध के भय से भागा समझेंगें । जिनके मत में तुम ऊँचे हो, उन्हीं की नजरों में गिर जाओगे ॥



 अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२- ३६॥

अहित की कामना से बहुत ना बोलने लायक वाक्यों से तुम्हारे विपक्षी तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करेंगें । इस से बढकर दुखदायी क्या होगा ॥



 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥२- ३७॥

यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि जीतते हो तो इस धरती को भोगोगे । इसलिये उठो, हे कौन्तेय, और निश्चय करके युद्ध करो ॥



 सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२- ३८॥

सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को ऐक सा देखते हुऐ ही युद्ध करो । ऍसा करते हुऐ तुम्हें पाप नहीं मिलेगा ॥



 एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२- ३९॥

यह मैने तुम्हें साँख्य योग की दृष्टी से बताया । अब तुम कर्म योग की दृष्टी से सुनो । इस बुद्धी को धारण करके तुम कर्म के बन्धन से छुटकारा पा लोगे ॥



 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२- ४०॥

न इसमें की गई मेहनत व्यर्थ जाती है और न ही इसमें कोई नुकसान होता है । इस धर्म का जरा सा पालन करना भी महान डर से बचाता है ॥



 व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥२- ४१॥

इस धर्म का पालन करती बुद्धी ऐक ही जगह स्थिर रहती है । लेकिन जिनकी बुद्धी इस धर्म में नहीं है वह अन्तहीन दिशाओं में बिखरी रहती है ॥



 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥२- ४२॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२- ४३॥

हे पार्थ, जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है, वेदों का भाषण करते हैं और जिनके लिये उससे बढकर और कुछ नहीं है, जिनकी आत्मा इच्छायों से जकड़ी हुई है और स्वर्ग जिनका मकस्द है वह ऍसे कर्म करते हैं जिनका फल दूसरा जनम है । तरह तरह के कर्मों में फसे हुऐ और भोग ऍश्वर्य की इच्छा करते हऐ वे ऍसे लोग ही ऐसे भाषणों की तरफ खिचते हैं ॥


 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२- ४४॥

भोग ऍश्वर्य से जुड़े जिनकी बुद्धी हरी जा चुकी है, ऍसी बुद्धी कर्म योग मे स्थिरता ग्रहण नहीं करती ॥



 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२- ४५॥

वेदों में तीन गुणो का व्यखान है । तुम इन तीनो गुणों का त्याग करो, हे अर्जुन । द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो । सत में खुद को स्थिर करो । लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो और खुद में स्थित हो ॥



 यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२- ४६॥

हर जगह पानी होने पर जितना सा काम ऐक कूँऐ का होता है, उतना ही काम ज्ञानमंद को सभी वेदों से है ॥ मतलब यह की उस बुद्धिमान पुरुष के लिये जो सत्य को जान चुका है, वेदों में बताये भोग प्राप्ती के कर्मों से कोई मतलब नहीं है ॥



 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२- ४७॥

कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं । कर्म को फल के लिये मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो ॥



 योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२- ४८॥

योग में स्थित रह कर कर्म करो, हे धनंजय, उससे बिना जुड़े हुऐ । काम सफल हो न हो, दोनो में ऐक से रहो । इसी समता को योग कहते हैं ॥



 दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२- ४९॥

इस बुद्धी योग के द्वारा किया काम तो बहुत ऊँचा है । इस बुद्धि की शरण लो । काम को फल कि इच्छा से करने वाले तो कंजूस होते हैं ॥



 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२- ५०॥

इस बुद्धि से युक्त होकर तुम अच्छे और बुरे कर्म दोनो से छुटकारा पा लोगे । इसलिये योग को धारण करो । यह योग ही काम करने में असली कुशलता है ॥



 कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥२- ५१॥

इस बुद्धि से युक्त होकर मुनि लोग किये हुऐ काम के नतीजों को त्याग देते हैं । इस प्रकार जन्म बन्धन से मुक्त होकर वे दुख से परे स्थान प्राप्त करते हैं ॥



 यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२- ५२॥

जब तुम्हारी बुद्धि अन्धकार से ऊपर उठ जाऐगी तब क्या सुन चुके हो और क्या सुनने वाला है उसमे तुमहें कोई मतलब नहीं रहेगा ॥



 श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥२- ५३॥

ऐक दूसरे को काटते उपदेश और श्रुतियां सुन सुन कर जब तुम अडिग स्थिर रहोगे, तब तुम्हारी बुद्धी स्थिर हो जायेगी और तुम योग को प्राप्त कर लोगे ॥



अर्जुन बोले

 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥२- ५४॥

हे केशव, जिसकी बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो चुकि है, वह कैसा होता है । ऍसा स्थिरता प्राप्त किया व्यक्ती कैसे बोलता, बैठता, चलता, फिरता है ॥


श्रीभगवान बोले

 प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२- ५५॥

हे पार्थ, जब वह अपने मन में स्थित सभी कामनाओं को निकाल देता है, और अपने आप में ही अपनी आत्मा को संतुष्ट रखता है, तब उसे ज्ञान और बुद्धिमता में स्थित कहा जाता है ॥



 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥२- ५६॥

जब वह दुखः से विचलित नहीं होता और सुख से उसके मन में कोई उमंगे नहीं उठतीं, इच्छा और तड़प, डर और गुस्से से मुक्त, ऐसे स्थित हुऐ धीर मनुष्य को ही मुनि कहा जाता है ॥



 यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२- ५७॥

किसी भी ओर न जुड़ा रह, अच्छा या बुरा कुछ भी पाने पर, जो ना उसकी कामना करता है और न उससे नफरत करता है उसकी बुद्धि ज्ञान में स्थित है ॥



 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२- ५८॥

जैसे कछुआ अपने सारे अँगों को खुद में समेट लेता है, वैसे ही जिसने अपनी इन्द्रीयाँ को उनके विषयों से निकाल कर खुद में समेट रखा है, वह ज्ञान में स्थित है ॥


 विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२- ५९॥

विषयों का त्याग के देने पर उनका स्वाद ही बचता है । परम् को देख लेने पर वह स्वाद भी मन से छूट जाता है ॥



 यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२- ६०॥

हे कौन्तेय, सावधानी से संयमता का अभयास करते हुऐ पुरुष के मन को भी उसकी चंचल इन्द्रीयाँ बलपूर्वक छीन लिती हैं ॥



 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२- ६१॥

उन सब को संयम कर मेरा धयान करना चाहिये, क्योंकि जिसकी इन्द्रीयाँ वश में है वही ज्ञान में स्थित है ॥



 ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२- ६२॥

चीजों के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उन से लगाव हो जाता है । इससे उसमे इच्छा पौदा होती है और इच्छाओं से गुस्सा पैदा होता है ॥



 क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२- ६३॥

गुस्से से दिमाग खराब होता है और उस से यादाश्त पर पड़दा पड़ जाता है । यादाश्त पर पड़दा पड़ जाने से आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाने पर आदमी खुद ही का नाश कर बौठता है ॥



 रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२- ६४॥

इन्द्रीयों को राग और द्वेष से मुक्त कर, खुद के वश में कर, जब मनुष्य विषयों को संयम से ग्रहण करता है, तो वह प्रसन्नता और शान्ती प्राप्त करता है ॥



 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२- ६५॥

शान्ती से उसके सारे दुखों का अन्त हो जाता है क्योंकि शान्त चित मनुष्य की बुद्धि जलदि ही स्थिर हो जाती है ॥



 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२- ६६॥

जो संयम से युक्त नहीं है, जिसकी इन्द्रीयाँ वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि भी स्थिर नही हो सकती और न ही उस में शान्ति की भावना हो सकती है । और जिसमे शान्ति की भावना नहीं है वह शान्त कैसे हो सकता है । जो शान्त नहीं है उसे सुख कैसा ॥



 इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२- ६७॥

मन अगर विचरती हुई इन्द्रीयों के पीछे कहीं भी लग लेता है तो वह बुद्धि को भी अपने साथ वैसे ही खीँच कर ले जाता है जैसे एक नाव को हवा खीच ले जाती है ॥



 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२- ६८॥

इसलिये हे महाबाहो, जिसकी सभी इन्द्रीयाँ अपने विषयों से पूरी तरह हटी हुई हैं, सिमटी हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है ॥



 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२- ६९॥

जो सब के लिये रात है उसमें संयमी जागता है, और जिसमे सब जागते हैं उसे मुनि रात की तरह देखता है ॥



 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२- ७०॥

नदियाँ जैसे समुद्र, जो एकदम भरा, अचल और स्थिर रहता है, में आकर शान्त हो जाती हैं, उसी प्रकार जिस मनुष्य में सभी इच्छाऐं आकर शान्त हो जाती हैं, वह शान्ती प्राप्त करता है । न कि वह जो उनके पीछे भागता है ॥



 विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥२- ७१॥

सभी कामनाओं का त्याग कर, जो मनुष्य स्पृह रहित रहता है, जो मै और मेरा रूपी अहंकार को भूल विचरता है, वह शान्ती को प्राप्त करता है ॥



 एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२- ७२॥

ब्रह्म में स्थित मनुष्य ऍसा होता है, हे पार्थ । इसे प्राप्त करके वो फिर भटकता नहीं । अन्त समय भी इसी स्थिति में स्थित वह ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता है ॥


॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥



गीता हिन्दी अनुवाद पहला अध्याय

पहला अध्याय

धृतराष्ट्र ने कहा :-

 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥१-१॥

हे संजय, धर्मक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डव के पुत्रों ने क्या किया ।

संजय बोले:

 दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥१-२॥

हे राजन, पाण्डवों की सेना व्यवस्था देख कर दुर्योधन ने अपने आचार्य के पास जा कर उनसे कहा ।

 पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥१-३॥

हे आचार्य, आप के तेजस्वी शिष्य द्रुपदपुत्र द्वारा व्यवस्थित की इस विशाल पाण्डू सेना को देखिये ।

 अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥१-४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥१-५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥१-६॥

इसमें भीम और अर्जुन के ही समान बहुत से महान शूरवीर योधा हैं जैसे युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज तथा नरश्रेष्ट शैब्य । विक्रान्त युधामन्यु, वीर्यवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु), और द्रोपदी के पुत्र - सभी महारथी हैं ।


 अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥१-७॥

हे द्विजोत्तम, हमारी ओर भी जो विशिष्ट योद्धा हैं उन्हें आप को बताता हूँ । हमारी सैन्य के जो प्रमुख नायक हैं उन के नाम मैं आप को बताता हूँ ।

 भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥१-८॥

आप स्वयं, भीष्म पितामह, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सौमदत्त (सोमदत्त के पुत्र) - यह सभी प्रमुख योधा हैं ।

 अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥१-९॥

हमारे पक्ष में युद्ध में कुशल, तरह तरह के शस्त्रों में माहिर और भी अनेकों योद्धा हैं जो मेरे लिये अपना जीवन तक त्यागने को त्यार हैं ।

 अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१-१०॥

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी सेना का बल पर्याप्त नहीं है, परन्तु भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना बल पूर्ण है ।

 अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥१-११॥

इसलिये सब लोग जिन जिन स्थानों पर नियुक्त हों वहां से सभी हर ओर से भीष्म पितामह की रक्षा करें ।

 तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥१-१२॥

तब कुरुवृद्ध प्रतापवान भीष्म पितामह ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुये उच्च स्वर में सिंहनाद किया और शंख बजाना आरम्भ किया ।

 ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१-१३॥

तब अनेक शंख, नगारे, ढोल, शृंगी आदि बजने लगे जिनसे घोर नाद उत्पन्न हुआ ।

 ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१-१४॥

तब श्वेत अश्वों से वहित भव्य रथ में विराजमान भगवान माधव और पाण्डव पुत्र अर्जुन नें भी अपने अपने शंख बजाये ।

 पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१-१५॥

भगवान हृषिकेश नें पाञ्चजन्य नामक अपना शंख बजाया और धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त नामक शंख बजाया । तथा भीम कर्मा भीम नें अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया ।

 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१-१६॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर नें अपना अनन्त विजय नामक शंख, नकुल नें सुघोष और सहदेव नें अपना मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ।

 काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१-१७॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥१-१८॥

धनुधर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट तथा अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रोपदी के पुत्र तथा अन्य सभी राजाओं नें तथा महाबाहु सौभद्र (अभिमन्यु) नें - सभी नें अपने अपने शंख बजाये ।


 स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१-१९॥

शंखों की उस महाध्वनि से आकाश और पृथिवि गूँजने लगीं तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय भिन्न गये ।

 अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥१-२०॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यवस्थित देख, कपिध्वज (जिनके ध्वज पर हनुमान जी विराजमान थे) श्री अर्जुन नें शस्त्र उठाकर भगवान हृषिकेश से यह वाक्य कहे ।

अर्जुन बोले:

 सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत  ॥१-२१॥
यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्‌धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥१-२२॥

हे अच्युत, मेरा रथ दोनो सेनाओं के मध्य में स्थापित कर दीजिये ताकी मैं युद्ध की इच्छा रखने वाले इन योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूं जिन के साथ मुझे युद्ध करना है ।


 योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥१-२३॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय चाहने वाले राजाओं को जो यहाँ युद्ध के लिये एकत्रित हुये हैं मैं देखूँ लूं ।

संजय बोले:

 एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥१-२४॥

हे भारत (धृतराष्ट्र), गुडाकेश के इन वचनों पर भगवान हृषिकेश नें उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में स्थापित कर दिया ।

 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥१-२५॥

रथ को भीष्म पितामह, द्रोण तथा अन्य सभी प्रमुख राजाओं के सामने (उन दोनो सेनाओं के बीच में) स्थापित कर, कृष्ण भगवान नें अर्जुन से कहा की हे पार्थ इन कुरुवंशी राजाओं को देखो ।

 तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥१-२६॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
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तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥१-२७॥

वहां पार्थ नें उस सेना में अपने पिता के भाईयों, पितामहों (दादा), आचार्यों, मामों, भाईयों, पुत्रों, मित्रों, पौत्रों, श्वशुरों (ससुर), संबन्धीयों को दोनो तरफ की सेनोओं में देखा ।


 कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।

इस प्रखार अपने सगे संबन्धियों और मित्रों को युद्ध में उपस्थित देख अर्जुन का मन करुणा पूर्ण हो उठा और उसने विषाद पूर्वक कृष्ण भगवान से यह कहा ।

अर्जुन बोले:

 दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्  ॥१-२८॥

हे कृष्ण, मैं अपने लोगों को युद्ध के लिये तत्पर यहाँ खडा देख रहा हूँ ।

 सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥१-२९॥

इन्हें देख कर मेरे अंग ठण्डे पड रहे है, और मेरा मुख सूख रहा है, और मेरा शरीर काँपने लगा है ।

 गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥१-३०॥

मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिरने को है, और मेरी सारी त्वचा मानो आग में जल उठी है । मैं अवस्थित रहने में अशक्त हो गया हूँ, मेरा मन भ्रमित हो रहा है ।

 निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥१-३१॥

हे केशव, जो निमित्त है उसे में भी मुझे विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि हे केशव, मुझे अपने ही स्वजनों को मारने में किसी भी प्रकार का कल्याण दिखाई नहीं देता ।

 न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥१-३२॥

हे कृष्ण, मुझे विजय, या राज्य और सुखों की इच्छा नहीं है । हे गोविंद, (अपने प्रिय जनों की हत्या कर) हमें राज्य से, या भोगों से, यहाँ तक की जीवन से भी क्या लाभ है ।

 येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥१-३३॥

जिन के लिये ही हम राज्य, भोग तथा सुख और धन की कामना करें, वे ही इस युद्ध में अपने प्राणों की बलि चढने को त्यार यहाँ अवस्थित हैं ।

 आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥१-३४॥

गुरुजन, पिता जन, पुत्र, तथा पितामहा, मातुल, ससुर, पौत्र, साले आदि सभी संबन्धि यहाँ प्रस्तुत हैं ।

 एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥१-३५॥

हे मधुसूदन । इन्हें हम त्रैलोक्य के राज के लिये भी नहीं मारना चाहेंगें, फिर इस धरती के लिये तो बात ही क्या है, चाहे ये हमें मार भी दें ।

 निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥१-३६॥

धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मार कर हमें भला क्या प्रसन्नता प्राप्त होगी हे जनार्दन । इन आततायिनों को मार कर हमें पाप ही प्राप्त होगा ।

 तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥१-३७॥

इसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रो तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना हमारे लिये उचित नहीं है । हे माधव, अपने ही स्वजनों को मार कर हमें किस प्रकार सुख प्राप्त हो सकता है ।

 यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥१-३८॥

यद्यपि ये लोग, लोभ के कारण जिनकी बुद्धि हरी जा चुकी है, अपने कुल के ही क्षय में और अपने मित्रों के साथ द्रोह करने में कोई दोष नहीं देख पा रहे ।

 कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥१-३९॥

परन्तु हे जनार्दन, हम लोग तो कुल का क्षय करने में दोष देख सकते हैं, हमें इस पाप से निवृत्त क्यों नहीं होना चाहिये (अर्थात इस पाप करने से टलना चाहिये) ।

 कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥१-४०॥

कुल के क्षय हो जाने पर कुल के सनातन (सदियों से चल रहे) कुलधर्म भी नष्ट हो जाते हैं । और कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर सभी प्रकार के अधर्म बढने लगते हैं ।

 अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥१-४१॥

अधर्म फैल जाने पर, हे कृष्ण, कुल की स्त्रियाँ भी दूषित हो जाती हैं । और हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्ण धर्म नष्ट हो जाता है ।

 संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥१-४२॥

कुल के कुलघाती वर्णसंकर (वर्ण धर्म के न पालन से) नरक में गिरते हैं । इन के पितृ जन भी पिण्ड और जल की परम्पराओं के नष्ट हो जाने से (श्राद्ध आदि का पालन न करने से) अधोगति को प्राप्त होते हैं (उनका उद्धार नहीं होता) ।

 दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥१-४३॥

इस प्रकार वर्ण भ्रष्ट कुलघातियों के दोषों से उन के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं ।

 उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥१-४४॥

हे जनार्दन, कुलधर्म भ्रष्ट हुये मनुष्यों को अनिश्चित समय तक नरक में वास करना पडता है, ऐसा हमने सुना है ।

 अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥१-४५॥

अहो ! हम इस महापाप को करने के लिये आतुर हो यहाँ खडे हैं । राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने के लिये व्याकुल हैं ।

 यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥१-४६॥

यदि मेरे विरोध रहित रहते हुये, शस्त्र उठाये बिना भी यह धृतराष्ट्र के पुत्र हाथों में शस्त्र पकडे मुझे इस युद्ध भूमि में मार डालें, तो वह मेरे लिये (युद्ध करने की जगह) ज्यादा अच्छा होगा ।

संजय बोले

 एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥१-४७॥

यह कह कर शोक से उद्विग्न हुये मन से अर्जुन अपने धनुष बाण छोड कर रथ के पिछले भाग में बैठ गये ।


।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ।।



ब्रह्म


हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें) । वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है । वो विश्व का आधार है । उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है । ब्रह्म एक, और सिर्फ़ एक ही है । वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी । वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है । वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है । वही परम ज्ञान है । ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म । परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है । वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित और अनन्त आनन्द है । ब्रह्म की पूजा नही की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है । उसका ध्यान किया जाता है । प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम पवित्र शब्द मानते हैं । ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है ।

आत्मा

आत्मा

हिन्दू धर्म के अनुसार हर मनुष्य में एक अभौतिक आत्मा होती है, जो सनातन और अमर है । हिन्दू धर्म के मुताबिक मनुष्य में ही नहीं, बल्कि हर पशु और पेड़-पौधे, यानि कि हर जीव में आत्मा होती है । मानव जन्म में अपनी आज़ादी से किये गये कर्मों के मुताबिक आत्मा अगला शरीर धारण करती है । अच्छे कर्म करने पर आत्मा कुछ समय के लिये स्वर्ग जा सकती है, या कोई गन्धर्व बन सकती है, य नव योनि में अच्छे कुलीन घर में जन्म ले सकती है । बुरे कर्म करने पर आत्मा को कुछ समय के लिये नरक जाना पड़ता है, जिसके बाद आत्मा निकृष्ट पशु-पक्षी योनि में जन्म लेती है । जन्म मरण का सांसारिक चक्र तभी ख़त्म होता है जब व्यक्ति को मोक्ष मिलता है । उसके बाद आत्मा अपने वास्तविक सत्-चित्-आनन्द स्वभाव को सदा के लिये पा लेती है । मानव योनि ही अकेला ऐसा जन्म है जिसमें मानव के पाप और पुण्य दोनो कर्म अपने फल देते हैं और जिसमें मोक्ष की प्राप्ति मुम्किन है ।

हिन्दुओं के प्रमुख धर्म ग्रन्थ


हिन्दू धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। इसके अन्तर्गत चार वेद आते हैं : ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। ये वेद श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि हिन्दुओं का मानना है कि इन वेदों को परमात्मा ने ऋषियों को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। वेदों को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा शिष्यों को दिया जाता था। हर वेद में चार भाग हैं- संहिता -- मन्त्र भाग, ब्राह्मण-ग्रन्थ -- गद्य भाग जिसमें कर्मकाण्ड समझाये गये हैं, आरण्यक -- इनमें अन्य गूढ बातें समझायी गयी हैं, उपनिषद् -- इनमें ब्रह्म, आत्मा और इनके सम्बन्ध के बारे में विवेचना की गयी है। श्रुति ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं, और अगर श्रुति और स्मृति में कोई विवाद होता है तो श्रुति ही मान्य होगी। श्रुति को छोड़कर अन्य सभी हिन्दू धर्मग्रन्थ स्मृति कहे जाते हैं, क्योंकि इनमें वो कहानियाँ हैं जिनको लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया और बाद में लिखा। सभी स्मृति ग्रन्थ वेदों की प्रशंसा करते हैं । इनको वेदों से निचला स्तर प्राप्त है, पर ये ज़्यादा आसान हैं और अधिकांश हिन्दुओं द्वारा पढ़े जाते हैं (बहुत ही कम हिन्दू वेद पढ़े होते हैं)। प्रमुख स्मृतिग्रन्थ हैं:- इतिहास--रामायण और महाभारत, भगवद गीता, पुराण--(18), मनुस्मृति, धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र, आगम शास्त्र। भारतीय दर्शन के ६ प्रमुख अंग हैं- साँख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त।

सांख्य एवं कर्म योग

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धर्म और काम

पूर्व मनीषियों के समान महर्षि वात्स्यायन ने भी सर्वप्रथम स्थान दिया है धर्म को। धर्म के अभाव में काम भटक जाता है। धर्म के प्रति जो आम धारणा है वह वास्तविक नहीं है। भजन, पूजन और पाखंड धर्म का पर्याय बन चुके हैं। केवल पूजा पाठ कर लेना एवं आडम्बर का प्रदर्शन करना ही धर्म नहीं है। धर्म का अर्थ है धारण करना। प्रश्न उठता है, क्या धारण करना है। सदगुणों को अपनाना, नैतिक मूल्यों का ध्यानपूर्वक पालन करना तथा अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करना ही मानव धर्म है। प्रायः हर धर्म ने नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन किया है। भगवान कृष्ण के अनुसार कर्म अर्थात कर्त्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही धर्म है। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा है- कर्त्तव्य का ही दूसरा नाम धर्म है। कर्म क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। प्रत्येक आयु समूह के व्यक्तियों तथा समुदायों के कर्त्तव्यों में भिन्नता हो सकती है, पर नैतिक मूल्य तो अपरिवर्तित ही रहेंगे।

विद्यार्थी का कर्त्तव्य है निष्ठापूर्वक अध्ययन करना, अध्यापक का कर्त्तव्य है अपने ज्ञान के द्वीप से बालमों में का द्वीप प्रज्वलित करना। पति का कर्त्तव्य है पत्नि के प्रति निष्ठावान रहते हुए सन्तान का पालन पोषण करना तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करना। इसी तरह हर क्षेत्र में अपने अपने कार्य एवं व्यवसाय में संलग्न व्यक्ति को अपने कार्य का सम्पासन नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए निष्ठापूर्वक करना है।

धर्म के समान ही जीवन में अर्थ की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आज के भटतिक युग में तो अर्थ की महिमा ही सर्वोपरि हो गई है। आज तो जैसे समस्त जीवन ही अर्थ केन्द्रित हो गया है। अर्थ और काम को ही वर्तमान में सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है- धर्म अर्थात नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया गया हैः इसीलिए आज का मानव जीवन असंतुलित होकर डगमगा गया है, भटक गया है। सर्व सम्पन्न होने पर भी आज मानव भीतर से खोखला, अशांत एवं पीड़ित है। अर्थ का वास्तविक प्रयोजन है स्वस्थ सुखी जीवन के लिए आवश्यक धनोपार्जन करना। धन के अभाव में जीना दूभर हो जाएगा। हर कदम पर धन की आवश्यक्ता होती है। धन का अर्थ केवल मुद्रा या सोना-चाँदी ही नहीं होता। विद्या, भूमि, मकान, अन्न, पशु आदि सभी धन ही हैं तथा अर्थ के अन्तर्गत आते हैं। भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, यात्रा, व्यवसाय, उद्योग सभी के लिए धन की आवश्यक्ता होती है। भूखे पेट न तो भजन हो सकता है और न ही कर्त्तव्य का निर्वाह। जीवन की गाड़ी धन के अभाव में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकती। इसलिए हमारे दिव्य दृष्टा महर्षियों ने धन के महत्व को स्वीकारा तथा धर्म के बाद उसे ही द्वितीय स्थान दिया है। धर्माश्रित अर्थ ही जीवन में सुख शान्ति का संचार कर सकता है।

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