Monday, April 11, 2011

रामनवमी Ramnavami


जन्मदिनों का निर्धारण जन्म के समय की ग्रह स्थिति और महीने के अनुसार किया जाता है। प्लैनेटैरियम नाम के सॉफ्टवेयर ने शोधकर्ताओं को राम के वास्तविक जन्म दिन का पता लगाने में मदद की है। यह तिथि है 5114 बी.सी. में 10 जनवरी। राम का राजतिलक 5089 बी.सी. में 5 जनवरी को निश्चित किया गया था। वे वनवास के लिए 1 दिन पहले चले गये। उस समय वे 25 वर्ष के थे। राम-रावण युद्ध 5076 बी.सी. में।अगस्त्यसंहिताके अनुसार चैत्र शुक्ल नवमीके दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्नकमें जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहोंकी शुभ दृष्टिके साथ मेषराशिपर विराजमान थे, तभी साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीरामका माता कौसल्याके गर्भसे जन्म हुआ।दिन के बारह बजे जैसे ही शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कि‌ए हु‌ए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हु‌ए तो मानो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो ग‌ईं।
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्॥( श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, प्रथम खण्ड, अष्टादशः सर्गः श्लोक 10 का अंश)
अर्थात् कौसल्या ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। उनके सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे, राजमहल एवं प्रजा जनों के बीच ख़ुशी छा गई। कैकेयी को भरत एवं सुमित्रा को लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न नाम के पुत्र हुए। चारों राजकुमार एक साथ समान वातावरण में पलने लगे। समय आने पर उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। छोटी अवस्था में ही विश्वामित्र मुनि के आश्रम में उनकी तपस्या में विघ्न डालने वाले राक्षसों को राम एवं लक्ष्मण ने वीरतापूर्ण मार गिराया। फिर तो ऋषियों के यज्ञ निर्विघ्न रूप से पूरे किए जाने लगे.
राम धर्म के मूर्तरूप हैं |भगवान राम की गुरू सेवा, जाति-पाँति का भेदभाव मिटाना, शरणागत की रक्षा, भ्रातृ-प्रेम, मातृ-पितृ भक्ति, एक पत्नी व्रत, पवनसुत हनुमान तथा अंगद कि स्वामी भक्ति, गिद्धराज की कर्तव्यनिष्ठा तथा केवट आदि के चरित्रो की महानता को अपनाना चाहीए। इन्ही विशेषताओं के कारण सदैव से वे जनमानस के अंतरतम में आत्मा के पर्याय के रूप में प्रतिष्टित हैं | रामनवमी के दिन उनका जन्मोत्सव मनाकर सारा भारत अपने आपको सदियों पुराणी परम्परा से जोड़ लेता है . रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया ।

Friday, April 1, 2011

व्यक्ति की अवधारणा Individual concept

    इन तीनो में से किस श्रेणी में आते हैं हम :---
      • अभिमान –जब कोई आग्रह पूर्वक हमें भोजन कल लिए बुलाये और हम नहीं जाएँ !
      • स्वाभिमान – भोजन के लिए गया और ऐसा महसूस हुआ कि उन्हें कस्ट हो रहा है तो फिर आगे से उनके यहाँ नहीं जाने की प्रतिज्ञा लेना !
      • निरभिमान – पहली बार तो उसने इज्जत से नहीं खिलाया था, पर अब ढ़ंग से बुला रहे हैं तो दुबारा खाना खाने चले जायेंगे ।

    Thursday, March 31, 2011

    पापमोचनी एकादशी

    महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र (गुजरात महाराष्ट्र के
    अनुसार फाल्गुन ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी के बारे में जानने की इच्छा
    प्रकट की तो वे बोले : ‘राजेन्द्र ! मैं तुम्हें इस विषय में एक पापनाशक
    उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाता के पूछने पर महर्षि
    लोमश ने कहा था ।’
    मान्धाता ने पूछा: भगवन् ! मैं लोगों के हित की इच्छा से यह सुनना चाहता
    हूँ कि चैत्र मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है, उसकी क्या
    विधि है तथा उससे किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया ये सब बातें मुझे
    बताइये ।
    मशजी ने कहा: नृपश्रेष्ठ ! पूर्वकाल की बात है । अप्सराओं से सेवित
    चैत्ररथ नामक वन में, जहाँ गन्धर्वों की कन्याएँ अपने किंकरो के साथ बाजे
    बजाती हुई विहार करती हैं, मंजुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर मेघावी को मोहित
    करने के लिए गयी । वे महर्षि चैत्ररथ वन में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन
    करते थे । मंजुघोषा मुनि के भय से आश्रम से एक कोस दूर ही ठहर गयी और
    सुन्दर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी । मुनिश्रेष्ठ मेघावी
    घूमते हुए उधर जा निकले और उस सुन्दर अप्सरा को इस प्रकार गान करते देख
    बरबस ही मोह के वशीभूत हो गये । मुनि की ऐसी अवस्था देख मंजुघोषा उनके
    समीप आयी और वीणा नीचे रखकर उनका आलिंगन करने लगी । मेघावी भी उसके साथ
    रमण करने लगे । रात और दिन का भी उन्हें भान न रहा । इस प्रकार उन्हें
    बहुत दिन व्यतीत हो गये । मंजुघोषा देवलोक में जाने को तैयार हुई । जाते
    समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेघावी से कहा: ‘ब्रह्मन् ! अब मुझे अपने देश जाने
    की आज्ञा दीजिये ।’
    मेघावी बोले: देवी ! जब तक सवेरे की संध्या न हो जाय तब तक मेरे ही पास
    ठहरो ।
    अप्सरा ने कहा: विप्रवर ! अब तक न जाने कितनी ही संध्याँए चली गयीं ! मुझ
    पर कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो कीजिये !
    लोमशजी ने कहा: राजन् ! अप्सरा की बात सुनकर मेघावी चकित हो उठे । उस समय
    उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते हुए
    उन्हें सत्तावन वर्ष हो गये । उसे अपनी तपस्या का विनाश करनेवाली जानकर
    मुनि को उस पर बड़ा क्रोध आया । उन्होंने शाप देते हुए कहा: ‘पापिनी ! तू
    पिशाची हो जा ।’ मुनि के शाप से दग्ध होकर वह विनय से नतमस्तक हो बोली :
    ‘विप्रवर ! मेरे शाप का उद्धार कीजिये । सात वाक्य बोलने या सात पद साथ
    साथ चलनेमात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है । ब्रह्मन् !
    मैं तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं, अत: स्वामिन् ! मुझ पर कृपा
    कीजिये ।’
    मुनि बोले: भद्रे ! क्या करुँ ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली
    है । फिर भी सुनो । चैत्र कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम है
    ‘पापमोचनी ।’ वह शाप से उद्धार करनेवाली तथा सब पापों का क्षय करनेवाली
    है । सुन्दरी ! उसीका व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी ।
    ऐसा कहकर मेघावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गये । उन्हें आया
    देख च्यवन ने पूछा : ‘बेटा ! यह क्या किया ? तुमने तो अपने पुण्य का नाश
    कर डाला !’
    मेघावी बोले: पिताजी ! मैंने अप्सरा के साथ रमण करने का पातक किया है ।
    अब आप ही कोई ऐसा प्रायश्चित बताइये, जिससे पातक का नाश हो जाय ।
    च्यवन ने कहा: बेटा ! चैत्र कृष्णपक्ष में जो ‘पापमोचनी एकादशी’ आती है,
    उसका व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जायेगा ।
    पिता का यह कथन सुनकर मेघावी ने उस व्रत का अनुष्ठान किया । इससे उनका
    पाप नष्ट हो गया और वे पुन: तपस्या से परिपूर्ण हो गये । इसी प्रकार
    मंजुघोषा ने भी इस उत्तम व्रत का पालन किया । ‘पापमोचनी’ का व्रत करने के
    कारण वह पिशाचयोनि से मुक्त हुई और दिव्य रुपधारिणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर
    स्वर्गलोक में चली गयी ।
    भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! जो श्रेष्ठ मनुष्य ‘पापमोचनी एकादशी’
    का व्रत करते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसको पढ़ने और सुनने
    से सहस्र गौदान का फल मिलता है । ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी, सुरापान
    और गुरुपत्नीगमन करनेवाले महापातकी भी इस व्रत को करने से पापमुक्त हो
    जाते हैं । यह व्रत बहुत पुण्यमय है ।

    अब प्रभु कृपा करहु इस भांति , सब तजि भजन करहु दिन राती |

    Thursday, February 10, 2011

    चरण स्पर्श के वैज्ञानिक फायदे

    सामान्यत: अधिकांश लोग घर के बड़े-बुजूर्ग, संत-महात्मा, वृद्ध आदि के पैर अवश्य छुते हैं। पैर छुने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा के पीछे कई कारण मौजूद हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बड़े लोगों के पैर छुने से हमारे पुण्य में बढ़ोतरी होती है। साथ ही उनके आशीर्वाद स्वरूप हमारा दुर्भाग्य दूर होता है और मन को शांति मिलती है।
    पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।
    किसी भी कार्य की शुरूआत के पहले हमें घर के बड़े-बुजूर्ग, माता-पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए। इससे कार्य में सफलता प्राप्त होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है हमारा मनोबल बढ़ता है।

    Friday, January 14, 2011

    सूर्यदेव के उत्तरायण का महापर्व : मकर संक्रांति

    उत्तरायण में सूर्य के प्रवेश का अर्थ कितना गहन है और आध्यात्मिक व धार्मिक क्षेत्र के लिए कितना पुण्यशाली है, इसका अंदाज सिर्फ भीष्म पितामह के उदाहरण से लगाया जा सकता है। महाभारत युग की प्रामाणिक आस्थाओं के अनुसार सर्वविदित है कि उस युग के महान नायक भीष्म पितामह शरीर से क्षत-विक्षत होने के बावजूद मृत्यु शैया पर लेटकर प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का इंतजार कर रहे थे।

    मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण में मकर संक्रांति के बारे में विशिष्ट उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण में व्रत विधि और स्कंद पुराण में संक्रांति पर किए जाने वाले दान को लेकर व्याख्या प्रस्तुत की गई है। यहाँ यह जानना जरूरी है कि इसे मकर संक्रांति क्यों कहा जाता है? मकर संक्रांति का सूर्य के राशियों में भ्रमण से गहरा संबंध है। वैज्ञानिक स्तर पर यह पर्व एक महान खगोलीय घटना है और आध्यात्मिक स्तर पर मकर संक्रांति सूर्यदेव के उत्तरायण में प्रवेश की वजह से बहुत महत्वपूर्ण बदलाव का सूचक है। सूर्य 6 माह दक्षिणायन में रहता है और 6 माह उत्तरायण में रहता है।

    परंपरागत आधार पर मकर संक्रांति प्रति वर्ष 14 जनवरी को पड़ती है। पंचांग के महीनों के अनुसार यह तिथि पौष या माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है। 14 जनवरी को सूर्य प्रति वर्ष धनु राशि का भ्रमण पूर्ण कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मकरराशि बारह राशियों में दसवीं राशि होती है। संक्रांति का अर्थ है बदलाव का समय। संक्रांति उस काल को या तिथि को कहते हैं, जिस दिन सूर्य एक राशि में भ्रमण पूर्ण कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है। इसे पुण्यकाल माना जाता है और संक्रमण काल के रूप में भी स्वीकारकिया जाता है।


    आध्यात्मिक उपलब्धियों एवं ईश्वर के पूजन-स्मरण के लिए इस संक्रांति काल को विशेष फलदायी माना गया है। इसलिए सूर्य जिस राशि में प्रवेश करते हैं उसे उस राशि की संक्रांति माना जाता है। उदाहरण के लिए यदि सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं तो मेष संक्रांति कहलाती है, धनु में प्रवेश करते हैं तो धनु संक्रांति कहलाती और 14 जनवरी को सूर्य मकर में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति के रूप में पहचाना जाता है।

    मकर राशि में सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अंतिम तीन चरण, श्रवण नक्षत्र के चारों चरण और धनिष्ठा नक्षत्र के दो चरणों में भ्रमण करते हैं। उत्तरायण में सूर्य के प्रवेश का अर्थ कितना गहन है और आध्यात्मिक व धार्मिक क्षेत्र के लिए कितना पुण्यशाली है, इसका अंदाज सिर्फ भीष्म पितामह के उदाहरण से लगाया जा सकता है। महाभारत युग की प्रामाणिक आस्थाओं के अनुसार सर्वविदित है कि उस युग के महान नायक भीष्म पितामह शरीर से क्षत-विक्षत होने के बावजूद मृत्यु शैया पर लेटकर प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का इंतजार कर रहे थे।

    भीष्म ने इच्छा-मृत्यु का वर प्राप्त कर लिया था। ऐसी भी मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण में होने का अर्थ मोक्ष के द्वार खुलना है। जुलियन कैलेंडर के अनुसार तो लगभग 23 दिसंबर से ही उत्तरायण सूर्य के योग बन जाते हैं, परंतु भारतीय पंचांगों के अनुसार यह तिथि 14 जनवरी को ही आती है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण के सूर्य के 6 माहों में देवताओं का एक दिन पूर्ण होता है और दक्षिणायन के सूर्य में उनकी एक रात पूरी होती है। इसी के साथ यह भी विश्वास जुड़ा है कि जो लोग उत्तरायण के सूर्य में प्राण त्यागते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है और जो लोग दक्षिणायन के सूर्य में मृत्यु को प्राप्त होते हैं उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ता है। इसलिए सूर्य के उत्तरायण को संसार में जन्म-मृत्यु के आवागमन से मुक्ति का मार्ग भी मानते हैं।

    मकर संक्रांति पर स्नान, व्रत, अनुष्ठान, पूजन, वन, यज्ञ, वेद पाठ, अभिषेक, दान आदि का विशेष महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि इस तारीख से दिन रोज तिल भर बढ़ने लगते हैं, इसलिए इसे तिल संक्रांति के रूप में भी मनाया जाता है। अँगरेजी महीनों के हिसाब से तो दिसंबरमें ही बड़े दिन होने लगते हैं। परंतु भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति या तिल संक्रांति से बड़े दिन माने जाते हैं।

    यह मौसम के परिवर्तन का सूचक भी है। सबसे पहले तो नियम-संयम से पवित्र नदी में स्नान करने को महत्व दिया गया है। यदि पवित्र गंगा का स्नान हो जाएतो सोने में सुहागा जैसी बात हो जाएगी। गंगा स्नान न हो पाए तो नर्मदा, क्षिप्रा, गोदावरी कोई भी नदी स्नान के लिए उपयुक्त है। इस पर्व पर तिल का इतना महत्व है कि स्नान करते समय जल में तिल डालकर स्नान करने का विधान है। तिल हमेशा से ही यज्ञ-हवन सामग्री में प्रमुखवस्तु माना गया है। मकर संक्रांति में तिल खाने से तिलदान तक की अनुशंसा शास्त्रों ने की है। संक्रांति पर देवों और पितरों को कम से कम तिलदान अवश्य करना चाहिए। सूर्य को साक्षी रखकर यह दान किया जाता है, जो अनेक जन्मों तक सूर्यदेव देने वाले को लौटाते रहते हैं। कहीं-कहीं तीन पात्रों में भोजन रखकर- 'यम, रुद्र एवं धर्म' के निमित्त दान दिया जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुरूप दान करना चाहिए।

    भूखों, असहाय लोगों और जरूरतमंदों को खिलाना ज्यादा पुण्यदायी है। संक्रांति व्रत की विधि भी विस्तार से बताई गई है। इसकेअनुसार स्नान से निवृत्ति के पश्चात अक्षत का अष्टदल कमल बनाकर सूर्य की स्थापना कर पूजन करना चाहिए। बंङ ऋषि के अनुसार यह व्रत निराहार, साहार, नक्त या एकमुक्त तरीके से यथाशक्ति किया जा सकता है, जिससे पापों का क्षय हो जाता है और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

    मकर संक्रांति का पर्व न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है, बल्कि भारी संख्या में अप्रवासी भारतीयों के दुनिया के कोने-कोने में फैले होने के कारण विश्व में अनेक स्थानों पर यह पर्व मनाया जाता है। उत्तरप्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी संक्रांति के देशजतरीके से जाना जाता है और मनाया जाता है। महाराष्ट्र अंचल में तिल-गुड़ के साथ मकर संक्रांति पर्व मनाने का रिवाज है।

    गुजरात में इस दिन दान-धर्म के कार्यक्रम होते हैं। खिचड़ी का दान किया जाता है और फिर स्वयं के लिए उपयोग किया जाता है। पूर्वी राज्यों में भी मकर संक्रांति पर्व से जनता अच्छी तरह वाकिफ है। इस पर्व पर गुजरात में तो व्यापक स्तर पर पतंगबाजी के मुकाबले आयोजित किए जाते हैं।

    पतंगबाजी की लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात में इस पर्व के अवसर पर लगभग दो करोड़ रुपए का पतंग का व्यवसाय होता है। इसी मकर संक्रांति के पर्व को तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में पोंगल पर्व के रूप में मनाते हैं। मकर संक्रांति का राष्ट्रव्यापी पर्व मूलतः सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश की पूजा है। यह सूर्य पर्व है, जिसकी आराधना का मूल उद्देश्य आत्मजागृति है।

    Thursday, November 25, 2010

    Swami Vivekanand

    12 जनवरी,1863 : कलकत्ता में जन्म
    सन् 1879 : प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश
    सन् 1880 : जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश
    नवंबर 1881 : श्रीरामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट
    सन् 1882-86 : श्रीरामकृष्ण परमहंस से संबद्ध
    सन् 1884 : स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास
    सन् 1885 : श्रीरामकृष्ण परमहंस की अंतिम बीमारी
    16 अगस्त, 1886 : श्रीरामकृष्ण परमहंस का निधन
    सन् 1886 : वराह नगर मठ की स्थापना
    जनवरी 1887 : वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा
    सन् 1890-93 : परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण
    24 दिसंबर, 1892 : कन्याकुमारी में
    13 फरवरी, 1893 : प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकंदराबाद में
    31 मई, 1893 : बंबई से अमेरिका रवाना
    25 जुलाई, 1893 : वैंकूवर, कनाडा पहुँचे
    30 जुलाई, 1893 : शिकागो आगमन
    अगस्त 1893 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन राइट से भेंट
    11 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
    27 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अंतिम व्याख्यान
    16 मई, 1894 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
    नवंबर 1894 : न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना
    जनवरी 1895 : न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ
    अगस्त 1895 : पेरिस में
    अक्तूबर 1895 : लंदन में व्याख्यान
    6 दिसंबर, 1895 : वापस न्यूयॉर्क
    22-25 मार्च, 1896 : वापस लंदन
    मई-जुलाई 1896 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
    15 अप्रैल, 1896 : वापस लंदन
    मई-जुलाई 1896 : लंदन में धार्मिक कक्षाएँ
    28 मई, 1896 : ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट
    30 दिसंबर, 1896 : नेपल्स से भारत की ओर रवाना
    15 जनवरी, 1897 : कोलंबो, श्रीलंका आगमन
    6-15 फरवरी, 1897 : मद्रास में
    19 फरवरी, 1897 : कलकत्ता आगमन
    1 मई, 1897 : रामकृष्ण मिशन की स्थापना
    मई-दिसंबर 1897 : उत्तर भारत की यात्रा
    जनवरी 1898: कलकत्ता वापसी
    19 मार्च, 1899 : मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना
    20 जून, 1899 : पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा
    31 जुलाई, 1899 : न्यूयॉर्क आगमन
    22 फरवरी, 1900 : सैन फ्रांसिस्को में वेदांत समिति की स्थापना
    जून 1900 : न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा
    26 जुलाई, 1900 : यूरोप रवाना
    24 अक्तूबर, 1900 : विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा
    26 नवंबर, 1900 : भारत रवाना
    9 दिसंबर, 1900 : बेलूर मठ आगमन
    जनवरी 1901 : मायावती की यात्रा
    मार्च-मई 1901 : पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा
    जनवरी-फरवरी 1902 : बोधगया और वारणसी की यात्रा
    मार्च 1902 : बेलूर मठ में वापसी
    4 जुलाई, 1902 : महासमाधि।

    Blog Archive